मोबाइल और कंप्यूटर ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र में कोर्सेज और करियर

आज डिजिटल वीडियो गेम बच्चों ही नहीं, बड़ों को भी खूब लुभा रहा है। यही कारण है कि यह फील्ड तेजी से आगे बढ़ रहा है। अगर आप भी रचनात्मकता में रूचि रखते हैं, कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन पर खेले जाने वाले गेम्स आपको आकर्षित करते हैं, तो टेक्निकल स्किल्स लेकर इस लोकप्रिय सेक्टर में करियर बना सकते हैं।

कंप्यूटर के बाद अब स्मार्ट फोन पर गेमिंग का क्रेज बढ़ रहा है। इस गेम के दीवाने बच्चे ही नहीं, युवा भी हैं। यही वजह है की गेमिंग मार्किट तेजी से बढ़ रहा है। नए-नए वीडियो गेम्स के लिए ऑगमेंटेड रियलिटी जैसी तकनीकें लोगों को खूब भा रही हैं, जिसमें अपनी सेल्फी के जरिये गेम के किसी कैरेक्टर का रूप धारण किया जा सकता है। वहीँ, जॉब्स के लिहाज से भी गेमिंग सेक्टर काफी हॉट है।

नैसकॉम की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की मौजूदा गेम इंडस्ट्री लगभग 900 मिलियन डॉलर (करीब 58000 करोड़ रूपये) तक पहुँच चुकी है। स्मार्ट फोन की बिक्री बढ़ने के साथ ही उद्योग में और विस्तार की उम्मीद जताई गयी है।



गेम डिजाइनिंग के कोर्स

  • एडवांस्ड डिप्लोमा इन गेम डिजाईन / डेवलपमेंट
  • एडवांस्ड सर्टिफिकेट कोर्स इन गेम आर्ट एंड इंटीग्रेशन
  • सर्टिफिकेट कोर्स इन गेम डिजाईन
  • डिप्लोमा इन एनीमेशन, गेमिंग एंड स्पेशल इफेक्ट्स
  • बीएससी इन गेमिंग
  • एमएससी इन गेमिंग
  • पीजी डिप्लोमा इन गेम डिजाईन / डेवलपमेंट
  • प्रोफेशनल डिप्लोमा इन गेम प्रोग्रामिंग

पर्सनल स्किल्स

वीडियो गेम इंडस्ट्री पूरी तरह से क्रिएटिव और टेक्निकल फील्ड है। यहाँ कलात्मक लोगों और आईटी ग्रेजुएट्स को तरजीह दी जाती है। इसलिए गेमिंग फील्ड में करियर बनाने वालों में कंप्यूटर में अभिरुचि के साथ-साथ गेम खेलने का शौक भी होना चाहिए। गेम डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल हो रही आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस और ऑगमेंटेड रियलिटी जैसी नई-नई तकनीक से वाकिफ होना होगा।

प्रोग्रामिंग लैंग्वेज सी, सी ++, विज़ुअल बेसिक, जावा, एमईएल, 2डी / 3डी तथा गणित की अच्छी जानकारी रखनी होगी। इसी तरह, अच्छी कम्युनिकेशन स्किल, विज़ुअलाइजेशन स्किल, ड्राइंग एप्टीट्युड, कलर की समझ और टीम वर्क जैसी स्किल इस प्रोफेशन में आगे बढ़ने के लिए बहुत जरुरी है।

गेम डेवलपर्स की भूमिका

गेम डेवलपर को वीडियो गेम्स डेवलपर या वीडियो गेम डिज़ाइनर भी कहा जाता है। आम तौर पर वीडियो गेम बनाने वाले सॉफ्टवेर डेवलपर या इंजिनियर ही होते हैं। इससे जुड़े प्रोफेशनल्स वीडियो या कंप्यूटर गेम्स के विकास के हर पहलू पर काम करते हैं, जिसमें गेम की डिजाइनिंग के अलावा कांसेप्ट, स्टोरी राइटिंग, कोडिंग प्रोग्रामिंग जैसे कार्य शामिल हैं।

गेम की पूरी निर्माण प्रक्रिया जैसे कार्य शामिल हैं। गेम की पूरी निर्माण प्रक्रिया एक टीमवर्क है। इसमें डिज़ाइनर्स, ग्राफ़िक आर्टिस्ट, प्रोग्रामर, प्रोड्यूसर और मार्केटिंग स्टाफ जैसे प्रोफेशनल्स भी सहयोग करते हैं। गेम डेवलपर किसी ख़ास गेम प्लेटफार्म के स्पेशलिस्ट होते हैं। यहाँ एसेट डेवलपमेंट और प्रोग्रामिंग डेवलपमेंट के अंतर्गत कई दूसरे डिपार्टमेंट भी होते हैं, जिनमें प्रोफेशनल्स अपनी सेवाएं देते हैं।

इसी तरह वीडियो गेम के ऑपरेटिंग इंस्ट्रक्शन और कोर फीचर के निर्माण कार्य के लिए प्रोग्रामर और सॉफ्टवेर डेवलपर के तौर पर कई एक्सपर्ट शामिल होते हैं।

जॉब के अवसर

दुनिया के साथ-साथ भारत में भी वीडियो गेमिंग का प्रसार दिनों-दिन बढ़ रहा है। मोबाइल के अलावा, ऑनलाइन गेम्स भी खूब पसंद किये जा रहे हैं। चूंकि भारत की आबादी में युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा है, सो इस संभावित बाजार को देखते हुए वीडियो गेम व सॉफ्टवेर से जड़ी बड़ी विदेशी कंपनियां यहाँ अपने बिज़नस का विस्तार कर रही हैं।



इनमें जॉब के अच्छे अवसर हैं। जॉब के बजाये आप चाहें तो फ्रीलान्स भी कर सकते हैं। अनुभव हो जाने पर आपके पास खुद का बिज़नस शुरू करने का भी विकल्प खुला होता है। आप किसी संस्थान में गेम डिजाईन / डेवलपमेंट के टीचर भी बन सकते हैं।

जॉब प्रोफाइल्स

गेमिंग इंडस्ट्री में स्पेशलाइजेशन का बड़ा महत्त्व है। यहाँ हर काम के लिए अलग-अलग एक्सपर्ट होते हैं। एक ही वीडियो गेम के ऑनलाइन, कंसोल, एंड्राइड और आईओएस जैसे अलग-अलग प्लेटफार्म के लिए अलग-अलग गेम वर्जन तैयार होते हैं, जिन्हें बनाने में दर्जनों लोगों की टीम लगती है। ऐसे लोगों के पास गेम प्लेटफार्म, गेम प्ले, प्रोग्रामिंग या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक में विशेषज्ञता होती है। वे एनवायरनमेंट डेवलपर, लेवल डेवलपर, एसेट डेवलपर के तौर पर काम करते हैं।

इस इंडस्ट्री की कुछ प्रमुख जॉब प्रोफाइल्स इस प्रकार हैं: एनिमेटर, डिजिटल वीडियो साउंड एडिटर, ग्राफ़िक प्रोग्रामर, प्रोड्यूसर / डायरेक्टर, टेक्निकल आर्टिस्ट / 3डी आर्टिस्ट, गेमिंग टेस्टर आदि।

सैलरी पैकेज

गेमिंग इंडस्ट्री में डेवलपर्स को आकर्षक सैलरी मिलती है। तीन से चार साल का अनुभव होने पर 40 से 80 हजार तक मासिक सैलरी आसानी से मिल जाती है। प्रोग्रामिंग के अनुभव और स्पेशलाइजेशन के आधार पर सैलरी कुछ वर्षों बाद लाख रूपये से भी ज्यादा हो सकती है। शुरुआत में ही वीडियो गेमिंग प्रोफेशनल्स को 25-30 हजार रूपये तक सैलरी आसानी से मिल जाती है।

प्रमुख संस्थान

भारतीय विद्यापीठ यूनिवर्सिटी, डीआईटीएम, पुणे

www.bvuadit.com

डीजीसी एनीमेशन एंड मल्टीमीडिया, दिल्ली

www.dgcindia.com

यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून

www.upes.ac.in

एडिट वर्क्स स्कूल ऑफ़ मास कम्युनिकेशन, नोएडा

www.editworks.co.in

महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ़ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी, लखनऊ

www.muit.co.in

फिक्की केपीएमजी की इंडियन मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट में वीडियो गेम्स इंडस्ट्री की विकास दर 2019 तक 25 प्रतिशत तक होने की उम्मीद है, जो बीते कुछ साल से 16 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रही है।

रिपोर्ट में आगामी दो वर्षों में गेमिंग का बाज़ार तीन गुना बढ़कर 4000 करोड़ रूपये तक पहुँच जाने की बात कही गयी है। वहीँ, ग्लोबल एंटरटेनमेंट एंड मीडिया आउटलुक 2015-2019 की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वीडियो गेम्स रेवेन्यू 2019 तक 9500 अरब डॉलर तक पहुँच जायेगा।

 

 



नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, दशपर्णी अर्क, नीम पेस्ट, फफूंद नाशक बनाने और छिडकाव की विधि

निमास्त्र

पानी                                       –     200 लीटर

गौमूत्र                                      –     10 लीटर

गाय का ताजा गोबर               –     2 किलो

नीम पेड़ की टहनियां              –     10 किलो (छोटी छोटी टुकड़े करके)

अथवा

नीम के बीजों का चूर्ण             –     10 किलो

लकड़ी से सव्य गति से चलाइये। बोरी से ढँक दें। वर्षा और ग्रीष्म काल में 48 घंटे छाया में रखें। शीत काल में चार दिन। सूरज की रौशनी, बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। दिन में दो बार सुबह और शाम घोलें। 48 घंटे या चार दिन बाद उसे पतले कपडे से छान कर भण्डारण कर लें।

भण्डारण

छह माह तक उसका उपयोग कर सकते हैं। सबसे उपयुक्त मिटटी के बर्तन, लोहे के ड्रम, सीमेंट का हौद आदि हैं। 200 लीटर निमास्त्र पानी मिलाये बिना खड़ी फसल पर छिड़कना है। छोटे पौधे हैं तो इतनी मात्र दो एकड़ के लिए, बड़े पौधे हैं तो एक एकड़ के लिए उपयोग में लाना है।

निमास्त्र से रस-चूसक कीट और छोटी इल्लीयाँ नियंत्रित होते हैं।

ब्रह्मास्त्र

गौमूत्र                                           –     20 लीटर

नीम के पत्तों की चटनी              –     2 किलो

अथवा

नीम के सूखे बीजों का चूर्ण         –     2 किलो

करंज के पत्तों की चटनी            –     2 किलो

सीताफल के पत्तों की चटनी     –     2 किलो

अरंडी के पत्तों की चटनी           –     2 किलो

धतूरा के पत्तों की चटनी           –     2 किलो

सभी को लकड़ी से घोलें। ढक्कन रखें। धीमी आंच पर एक उबाल आने दें। उसके बाद उसे ठंडा होने दें। दिन में दो बार घोलें। उसके बाद उसे ढँक कर रखें। वर्षा और ग्रीष्म काल में 48 घंटे छाया में रखें। शीत काल में चार दिन। सूरज की रौशनी, बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। दिन में दो बार सुबह और शाम घोलें। 48 घंटे या चार दिन बाद उसे पतले कपडे से छान कर भण्डारण कर लें।

भण्डारण और प्रयोग

छह माह तक उसका उपयोग कर सकते हैं। 100 लीटर पानी में 3 लीटर ब्रह्मास्त्र। या 15 लीटर पानी में आधा लीटर ब्रम्हास्त्र मिलाकर छिडकाव करना है। सभी रस चूसने वाले कीट और इल्लियाँ नियंत्रित होती हैं। परन्तु फल के अन्दर छुपी इल्लियाँ नियंत्रित नहीं होतीं।

आग्नेयास्त्र

गौमूत्र                                       –     20 लीटर

नीम के पत्तों की चटनी          –     2 किलो

अथवा

नीम के सूखे फलों का चूर्ण      –     2 किलो

तम्बाकू पाउडर                        –     आधा किलो

तीखी हरी मिर्च की चटनी        –     2 किलो

देसी लहसुन की चटनी             –     250 ग्राम

सभी को लकड़ी से घोलें। ढक्कन से ढँक दें। धीमी आँच पर एक उबाल लें। फिर कपडा से पकड़कर नीचे रखकर ठंडा होने दें। 48 घंटे तक ठंडा होने दें। दिन में सुबह शाम दो बार घोलें। उसके बाद उसे कपडे से छान लें। भण्डारण करें। 3 माह तक इसका उपयोग किया जा सकता है।

छिडकाव की विधि

100 लीटर पानी में 3 लीटर या 15 लीटर पानी में आधा लीटर आग्नेयास्त्र। छोटे पौधे हों तो 2 एकड़ और बड़े पौधे हों तो एक एकड़ में इतनी मात्र का उपयोग करना है।



दशपर्णी अर्क

पानी                                    –     200 लीटर

गौमूत्र                                  –     10 लीटर

ताजा गोबर                         –     2 किलो

लकड़ी से इनको घोल लें।

हल्दी पाउडर                       –     500 ग्राम

देसी अदरक की चटनी       –     500 ग्राम

हींग पाउडर                         –     10 ग्राम

इनको भी लकड़ी से ऊपर के घोल में घोल दें। बोरी से ढंकें। रात भर रखा रहने दें।

दूसरे दिन

तम्बाकू पाउडर                    –     एक किलो

तीखे हरी मिर्ची की चटनी    –    एक किलो

देसी लहसुन की चटनी        –     आधा किलो

इनको भी लकड़ी से घोल दें। बाद में ढांककर रात भर रखा रहने दें।

तीसरे दिन

नीचे लिखे पत्तों में से कोई दस प्रकार के पत्ते 2-2 किलो लें, जिनमें से पहले पांच महत्वपूर्ण हैं, उनको घोल में डालकर डुबा देना है।

नीम की छोटी-छोटी टहनियां पत्तियों सहित, सीताफल, करंज, अरंडी, धतूरा, बेलपत्र, आक, गुल्टेना, आम, अमरुद, पपीता, गिलोय, अनार, बबूल की सूखी फल्ली का चूर्ण, गुडल, अदरक, अर्जुन, गेंदा के पंचांग (तना, पत्ते, जड़ें, डाली आदि)।

बोरी से ढांककर छाया में रखें। दिन में दो बार सुबह शाम चलाना है। बारिश और धूप नहीं लगनी चाहिए। एक माह से 40 दिन तक रखें।

भण्डारण   

कपडे से छान लें। पत्तियों को अच्छे से निचोड़ लें। छह माह तक इसका उपयोग किया जा सकता है। सभी प्रकार के कीटों का नियंत्रण होता है। 100 लीटर पानी में 3-4 लीटर दशपर्णी अर्क या 15 लीटर में 500-600 मिली-लीटर अर्क की मात्रा।

नीम पेस्ट (बोडो पेस्ट का प्राकृतिक विकल्प)

पानी                                  –     50 लीटर

गोमूत्र                                –     20 लीटर

गोबर                                 –     20 किलो

नीम के पत्तों की चटनी  –     10 किलो

हल्दी पाउडर                    –     आधा किलो

सौंठ पाउडर                      –     200 ग्राम

हींग पाउडर                       –     10-20 ग्राम

इनको मिलकर अच्छे से घोलें। दिन में दो बार लकड़ी से चलाना है। 48 घंटे छाया में रखें। 48 घंटे पश्चात इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। सात दिनों के अन्दर इस्तेमाल कर लेना है। प्रथम लेपन कृतिका नक्षत्र में मई के मध्य में लगाना है। दूसरा हस्त नक्षत्र में सितम्बर के आखिरी और अक्टूबर के पहले सप्ताह में लगाना है।  तृतीय लेपन सूर्य के उत्तरायण प्रवेश काल में 21 दिसंबर से लेकर 14 जनवरी के बाच में, चतुर्थ लेपन फाल्गुन पूर्णिमा होली से लेकर चैत प्रतिपदा तक लगाना है।

फफूंद नाशक

दवा नंबर 1

पानी            –     200 लीटर

जीवामृत      –     10-20 लीटर

जीवामृत अनंतकोटि सूक्ष्म जीवाणुओं का सर्वोत्तम जामन है। साथ में यह फफूंदनाशी दवा भी है। जन्तुरोधक, विषाणुनाशक (एंटी वायरल), संजीवक (हार्मोनल) है।

दवा नंबर 2

पानी            –     200 लीटर

खट्टी छाछ    –     5 लीटर

खट्टा मठा (मही) भी सर्वोत्तम फफूंदनाशी, जन्तुरोधक, विषाणुनाशक और संजीवक है। उसमें ऐसे पिंड होते हैं जो प्रतिरोधक शक्ति बढाते हैं।

दवा नंबर 3

पांच किलो जंगल में गिरी गिरे देसी गाय के कंडे (उपले) को बारीक करें। कपडे में उसकी पोटली बांधें। रस्सी से उसे उसे 200 लीटर पानी में लटका दें। 24 घंटे तक रखने के बाद, जब पानी ताम्र वर्णीय हो जाये, पोटली बाहर निकाल कर निचोड़ लें। तीन बार उसे डुबाये और निचोड़ें। कपडे से छान लें और 48 घंटे के अन्दर छिडकाव करें।

दवा नंबर 4

एक बर्तन में दो लीटर पानी लें। उसमें 200 ग्राम सौंठ पाउडर घोलें। ढंककर उसे उबालें। उबल जाने के बाद उसे नीचे उतारें और ठंडा होने दें। दूसरे बर्तन में दो लीटर दूध लें। उसे भी ढंककर कम आंच पर उबाल लें। एक उबाल के पश्चात उसे ठंडा होने दें। चम्मच से मलाई निकाल लें।

200 लीटर पानी में सौंठ का अर्क डालें। मलाई रहित दूध भी उसमें डाल दें। घोलकर उसे बोरी से ढँक कर रखें। दो घंटे बाद कपडे से छान लें। 24 घंटे के अन्दर छिडकाव करें।

राम बाण दवा

पानी           –     200 लीटर

जीवामृत     –     15 लीटर (कपडे से छाना हुआ)

खट्टा मठा    –     5 लीटर (8-10 दिन पुराना)

इन सभी को मिलाना है।  कपडे से छानकर तुरंत उपयोग में लाना है।

दवाओं का छिडकाव कब करना है

फसल और फलों के दैनिक निरीक्षण के दौरान जिस दिन पत्तों के पिछले हिस्सों पर धूप में कीटों के अंडे या कीट दिखाई दें तुरंत कीटनाशक दवाओं के छिडकाव करना है। अगर कीटों के अण्डों या कीट दिखाई न दें तो दवा नहीं छिड़कना है।

फफूंदनाशक का छिडकाव कब करना है

दैनिक निरीक्षण के दौरान जिस दिन पत्तों के अग्र या किनारे छोटे छोटे, लाल, पीले, काले, धब्बे, दिखाई दें, समझ लीजिये फफूंद जंतु आ गए हैं। तुरंत छिडकाव करना है। धब्बे दिखाई न दें तो छिडकाव नहीं करना है।