जीवामृत, घन-जीवामृत और बीजामृत बनाने और उपयोग करने की विधि

जीवामृत

जीवामृत अनंतकोटी उपयुक्त जीवाणुओं का सर्वोच्च जामन है। ठीक वैसे ही जैसे हमें दूध से दही ज़माने के लिए थोड़े से दही की जरुरत पड़ती है।

एक एकड़ खेती के लिए

पानी                                                    –     200 लीटर

देसी गाय का मूत्र                               –     5-10 लीटर (जितना पुराना उतना अच्छा)

देसी गाय का गोबर                            –     10 किलो

इन तीनों को एक ड्रम में डालकर घड़ी की सुई की दिशा में लकड़ी से चलाकर मिलाना है।

गुड़ (काला सबसे अच्छा)                   –     एक किलो (पानी में घोलकर मिलाना है)

गन्ने का रस                                       –     चार लीटर (अगर गुड़ न हो)

मीठे फलों का गूदा                              –     एक किलो (अगर गुड़ न हो)

गन्ने के छोटे छोटे टुकड़े                    –     10 किलो (अगर गुड़ न हो)

बेसन                                                   –     एक किलो

पीपल / बरगद के नीचे की मिटटी    –     एक मुट्ठी

इन सभी को मिला दें। बोरी से ढँक दें।  दिन में दो बार सुबह शाम 1-2 मिनट के लिए चलाना है। सातवें दिन से 12वें दिन तक छिडकाव से सर्वोत्तम परिणाम आते हैं।

कितना डालना है – 200 से 400 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ महीने में एक या दो बार डालना है।

विधि –       सिंचाई के पानी के साथ, सीधा भूमि के ऊपर दो पौधों के बीच मे, खड़ी फसल पर छिडकाव

घन-जीवामृत

 एक एकड़ की मात्रा

सूखा छाना हुआ गोबर खाद  –     200 किलो

जीवामृत                                 –     10% यानी 20 लीटर छिड़ककर मिलायें

छाया में ढेर लगा दें। बारिश और धूप नहीं पड़नी चाहिए। शीत काल में चार दिन, ग्रीष्म और वर्षा काल में 4 दिन रखें। उसके बाद उसे धूप में सुखायें। दिन में 2-3 बार उसे ऊपर नीचे करें ताकि सभी कणों को धूप मिल सके।

सूखने के पश्चात उसे लकड़ी की मुगरी से कूट कर बारीक करें। उसे छान लें। जूट की बोरी में भरकर रखें। एक वर्ष तक इस भण्डारण करके उपयोग में लाया जा सकता है।



गोबर गैस स्लरी से बना घन-जीवामृत

गोबर गैस स्लरी (सुखाकर)   –     150 किलो

देसी गाय का गोबर                –     50 किलो

जीवामृत                                 –     2 लीटर

गुड़                                           –     एक किलो

बेसन                                       –     एक किलो

फावड़े से मिलकर छाया में कम से कम 24 घंटे के लिए ढेर लगाना है। सूरज की रौशनी और बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। शीत काल में चार दिन, ग्रीष्म और वर्षा काल में 4 दिन रखें। उसके बाद उसे धूप में सुखायें। दिन में 2-3 बार उसे ऊपर नीचे करें ताकि सभी कणों को धूप मिल सके।

उपयोग की विधि – खेत की जोताई के समय 200 किलो घन-जीवामृत अंतिम जोताई के साथ मिटटी में मिलाना है। बारानी यानी असिंचित खेती में 400 किलो प्रति एकड़ सम मात्र में खेत की मिटटी में मिला दें।

बूस्टर डोज़ – फसल जब फूलों की स्थिति में हो, उस समय प्रति एकड़ 100 किलो घन-जीवामृत डाल दें। सिंचित क्षेत्र में जितना प्रभाव जीवामृत देता है, उतना ही प्रभाव असिंचित क्षेत्र में घन-जीवामृत देता है।

बीजामृत

क्यों बीजों का बीजामृत से संस्कारित करना जरुरी है

हवा में नमी की मात्र बढ़ने पर नुक्सान करने वाले फफूंद और जंतु विशाल मात्रा में फ़ैल जाते हैं। जो बीजों पर भी चिपक जाते हैं। अगर इन्हें उपचारित या संस्कारित नहीं किया गया तो ये बीजों के साथ मिटटी में जाकर अपनी संख्या बढाते हैं। जड़ों में घुसकर पूरे पौधे में फ़ैल जाते हैं। सारे पौधे बीमार ग्रस्त हो जाते हैं। इन्हें ही जड़ों से फैलने वाली बीमारियाँ कहते हैं। इसे रोकने के लिए ही बीज का संस्करण या उपचार जरुरी है।

100 किलो बीज संस्करण के लिए

पानी                          –     20 लीटर

देसी गाय का मूत्र      –     5 लीटर

देसी गाय का गोबर   –     5 किलो

जीवाणु मिट्टी             –     एक मुट्ठी

पानी में घोला चूना    –     50 ग्राम

लकड़ी से सव्य गति से घोलना है। बोरी से ढँककर रखना है। रात भर छाया में रखना है। सुबह एक बार और घोलकर बीज संस्करण करना है।

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