नर्मदा प्रदेश बनेंगे निकट भविष्य में भीषण बाढ़ और सूखा के कुरुक्षेत्र – जल बिरादरी की चेतावनी

‘जल जन जोड़ो अभियान’ के तहत देश भर में काम कर रहे संगठन ‘जल बिरादरी’ ने कहा है कि केरल जैसी बाढ़ की तबाही और बुंदेलखंड जैसे सूखे के कुप्रभाव नर्मदा क्षेत्र में आने वाले क्षेत्र मध्यप्रदेश, गुजरात और उनके के सभी जिले पर पड़ेंगे। ये दोनों आपदाएं दिखने में प्राकृतिक लगेंगी लेकिन ये हैं पूरी तरह मानव निर्मित।

पहला भीषण बाढ़ और दूसरा सूखा। एक तरफ वे क्षेत्र होंगे जो जल की अति उपलब्धता यानी बाढ़ से पीड़ित होंगे और दूसरा वे क्षेत्र होंगे जो जल की अति अनुपलब्धता यानी कमी से ग्रस्त होंगे। संकट का सीधा सम्बन्ध जल से ही रहेगा। जल या तो बहुत ज्यादा होगा या बिलकुल नहीं होगा।

नागपुर, मुंबई, दिल्ली, भोपाल, चेन्नई, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड के बाद अब केरल – बाढ़ से होने वाली तबाही हर साल की आम कहानी है। लगभग 8 माह पश्चात गर्मियों में पानी के लिये हाहाकार की ख़बरें आम हो जाएँगी। छोटे हों या बड़े – सभी शहरों के डेवलपमेंट में हमारे छतों, गलियों, सड़कों में गिरने और बहने वाले पानी की ठीक निकासी के लिये पंचायत से लेकर केंद्र तक कोई सरकार बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम नहीं कर रही।

हम अपने ही छत के पानी को अपने ही बोर में नहीं पहुँचा रहे। यह काम तो हमें स्वयं ही करना होता है। इतना कर लेने मात्र से बाढ़ बहुत कम हो जाये।

नदी, जल, जंगल, जमीन और उसके पर्यावरण के साथ जो खिलवाड़ और लापरवाही हम थोड़ी थोड़ी प्रतिदिन करते हैं, प्रकृति उसका हिसाब चंद मिनटों में कर देती है। हम रोज अपने घर और ऑफिस का कचरा प्रकृति के इन दूतों की झूली में फेंकते जाते हैं।

एक दिन की भीषण बारिश, तूफ़ान, आंधी यह कचरा हमें एक पल में वापस करके तबाही मचा देती है। जितना कचरा केरल में नदी, नालों, तालाबों, भूमिगत स्रोतों, समुद्र आदि में फेंका गया वो सब उसने एक झटके में हमारे गांवों, शहरों, घरों और गलियों में ससम्मान वापस कर दिया। प्रकृति का काम है देना। वह अपने पास कुछ बचाकर नहीं रखती। आप उसे जो भी दोगे, वक़्त आने पर वह उसे वापस कर देगी।

नर्मदा का अंधाधुंध रेत खनन भविष्य में बाढ़ और सूखा की नींव

नर्मदा नदी का पानी पाइपलाइन के द्वारा शहरों में लाने के लिए अरबों रूपये बर्बाद कर रहे हैं। होना इसके विपरीत चाहिए।  बारिश में गिरने और बहने वाला पानी सड़कों, घर और भवन की छतों, शहरों, गांवों से इसी तरह की पाइपलाइन और अन्य जल संरचनाओं के माध्यम से सूखी नदियों, तालाबों और भूजल स्रोतों में पहुचाया जाना चाहिए।

परन्तु जल संकट से निपटने के लिये सरकारें नदियों को जोड़ने पर काम कर रहे हैं।  2-3 महिने की बारिश और देश भर का पानी अगर उन नदियों, भूजल स्रोतों, तालाबों, नहरों आदि में पहुँचाने की परियोजनाएं बनें तो बाढ़ के ऐसे आतंक देखने न मिलें। सभी बाढ़ प्राकृतिक कम कृत्रिम ज्यादा बना ली गयी हैं।



गंगा सहित तमाम अन्य बड़ी नदियों की तरह नर्मदा और उसकी सभी सहायक नदियों में से जिस रफ़्तार से रेत खाली की जा रही है, उसकी वजह से आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश और गुजरात भी ऐसी भीषण बाढ़ से ग्रसित होंगे। पेड़ वर्षा जल के बहाव को कम करते हैं, जल के बहाव के लिए स्पीड ब्रेकर की तरह काम करते हैं। और नदी की रेत जल को अपने अन्दर ढांक कर रखती है। इन दोनों के अभाव में जल का मद मस्त होकर बाढ़ के रूप में गाँव और शहरों में तबाही मचाना स्वाभाविक है।

अति बाढ़ और अति जल संकट – ये हमारे भारत की वर्तमान हकीकत है। इस विरोधाभास के जिम्मेदार हम सब हैं जो सभी राजनैतिक पार्टियों की सभी सरकारों द्वारा किये जाने वाले अंधाधुंध बिना योजना के विकास कार्यों की हाँ में हाँ और न में न मिला देते हैं।

जानना ही कुछ करने की शुरुआत है। कम से कम इतना जान लें कि बाढ़ और जल संकट दोनों हमारे अपने द्वारा बनाये संकट हैं। जब तक हमें लगेगा यह सिर्फ नेताओं का किया धरा है तब तक हम उसके उपायों के बारे में कुछ नहीं करेंगे। राजनैतिक पार्टियाँ, सरकार और नेता अगर कोई भ्रष्टाचार करते हैं तो उसका पहला और मूल कारण हमारा अज्ञान और उदासीनता है। समस्याओं का सही ज्ञान होना उनके हल की तरफ पहला कदम है।

इसी समझ और ज्ञान को को बढाने के लिए तरुण भारत संघ में प्रत्येक माह तीन दिन का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जाता है जिसमें देश और विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, छात्र-छात्रा, प्रशासनिक अधिकारी और जागरूक गणमान्य प्रशिक्षण में भाग लेने आते हैं।

मध्यप्रदेश सहित भारत देश के सभी राज्यों, वहाँ की जनता, किसानों की भूमि आदि को जल संकट, बाढ़ और सूखा से बचाने के लिए ‘जल जन जोड़ो अभियान’ में सक्रिय भागीदारी निभाएं। यह काम अकेले सरकार और सामाजिक संगठनों का नहीं है। संकट यह देखकर दस्तक नहीं देता कि भ्रष्टाचार नेताओं ने किया है इसलिए इसका शिकार आम जनता को न बनाया जाए। दुर्भाग्य से शिकार हमेशा आम जनता ही होती है। नेता, उनका परिवार और राजनैतिक पार्टियाँ कभी इसका शिकार नहीं होतीं।



गोबर बन सकता है अच्छी खासी कमाई का जरिया

भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्यारी गाय और भगवान शंकर तक हमारी प्रार्थनाएं पहुँचाने वाला नंदी आज दर-दर की ठोकर, कचरा, पन्नी-प्लास्टिक खाने मजबूर है। गौवंश के गोबर और मूत्र पर आधारित देसी खाद और कीटनियंत्रकों पर टिकी हमारी सदियों पुरानी खेती भी विदेशी रासायनिक उर्वरक और ज़हर युक्त कीटनाशकों के हाथों गिरवी रखी जा चुकी है।

यह तथ्य प्रमाणिक है कि विश्व में गोबर और मूत्र से बनी खाद और कीटनियंत्रकों से बेहतर कुछ नहीं है जो न केवल आदमी बल्कि धरती के स्वास्थ्य की भी रक्षा करती है। गौवंश से  के गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद के अलावा उनसे बने उपले, धूपबत्ती, मच्छर coil, मूर्तियाँ, लकड़ी, ईंधन गैस, बिजली, ऑटोमोबाइल में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी भी बनती है।

परंतु सरकारी उदासीनता की वजह से हम पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, कोयला आदि पर निर्भर हैं। देश के अरबों रूपये विदेश से यह सब खरीदने में व्यर्थ करते हैं।

इस उदासीनता के बीच देश के कई गौ अनुसन्धान केंद्र और गौ-शालाएं गौवंश को न केवल बचाकर रखने का नेक काम कर रही हैं, बल्कि अन्य गौ-वंश पालकों का मार्गदर्शन भी कर रही हैं और सिखा रही हैं कि कैसे केवल गोबर और मूत्र से लाखों की मासिक कमाई की जा सकती है। देश भर में फैले गौ-वंश को काटे जाने के वैध और अवैध बूचडखानों, तस्करी के धंधे के बीच ये अनुसन्धान केंद्र उम्मीद की एक मात्र किरण हैं।

गोबर से कमाई कैसे

गोबर से खाद और बायो गैस बनने के बारे में तो सभी ने सुना होगा, लेकिन आज हम आपको गोबर से बने गमले और अगरबत्ती के बारे में बताएंगे, कि कैसे गोबर आपकी कमाई का बेहतर जरिया बन सकता है। इलाहाबाद जिले के कौड़िहार ब्लॉक के श्रींगवेरपुर में स्थित ‘बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान’ में गोबर से बने उत्पादों को बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं दूसरे प्रदेशों के भी कई लोग इसका प्रशिक्षण ले चुके हैं।



प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं, “हमारे यहां गोबर की लकड़ी भी बनाई जाती है, इसका हम प्रशिक्षण भी देते हैं, इसे ‘गोकाष्ठ’ कहते हैं। इसमें लैकमड मिलाया गया है, इससे ये ज्यादा समय तक जलती है। गोकाष्ठ के बाद अब गोबर का गमला भी काफी लोकप्रिय हो रहा है। गोबर से गमला बनने के बाद उसपर लाख की कोटिंग की जाती है। ये काफी प्रभावशाली है।”

जब कोई पौधा नर्सरी से लाते हैं तो वह प्लास्टिक की थैली में दिया जाता है और थैली हटाने में थोड़ी भी लापरवाही की जाए तो पौधे की जड़ें खराब हो जाती हैं और मिट्टी में लगाने पर पौधा पनप नहीं पाता। इस स्थिति से बचने के लिए गोबर का गमला काफी उपयोगी है। गमले को मशीन से तैयार किया जाता है।

इसमें मिट्टी भरकर पौधा लगाइए और जब इस पौधे को जमीन की मिट्टी में लगाना हो तो गड्ढा कर इस गमले को ही मिट्टी में दबा दीजिए। इससे पौधा खराब नहीं होगा और पौधे को गोबर की खाद भी मिल जाएगी। पौधा आसानी से पनप जाएगा।

संस्थान में केले के तने का भी अच्छा प्रयोग किया जा रहा है, प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं कि केले के तने से साड़ियां भी बनती हैं। इसी तरह से गोबर से ‘एनर्जी केक’ बनाया जाता है, जो अंगीठी में तीन-चार घंटे तक आसानी से जल जाता है। ये गैस की तरह ही जलाया जाता है। इसी तरह ‘स्टिकलेस अगरबत्ती’ भी बनाई जाती है।”

बायोवेद शोध संस्थान लाख के कई तरह के के मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्माण का प्रशिक्षण देकर कई हजार परिवारों को रोजगार के साथ अतिरिक्त आय का साधन उपलब्ध करा रहा है। संस्थान के निदेशक डॉ. बी.के. द्विवेदी बताते हैं कि जानवरों के गोबर,  मूत्र में लाख के प्रयोग से कई मूल्यवर्धित वस्तुएं बनाई जा रही हैं।

गोबर का गमला, लक्ष्मी-गणेश, कलमदान, कूड़ादान, मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती, जैव रसायनों का निर्माण, मोमबत्ती एवं अगरबत्ती स्टैण्ड व पुरस्कार में दी जाने वाली ट्रॉफियों का निर्माण आदि शामिल हैं। इन सभी वस्तुओं का निर्माण बायोवेद शोध संस्थान करा रहा है।

नागपुर के पास देवलापर स्थित ‘गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र’ भी इसी तरह का प्रशिक्षण अपने केंद्र में प्रत्येक माह निःशुल्क प्रदान करता है।