नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, दशपर्णी अर्क, नीम पेस्ट, फफूंद नाशक बनाने और छिडकाव की विधि

निमास्त्र

पानी                                       –     200 लीटर

गौमूत्र                                      –     10 लीटर

गाय का ताजा गोबर               –     2 किलो

नीम पेड़ की टहनियां              –     10 किलो (छोटी छोटी टुकड़े करके)

अथवा

नीम के बीजों का चूर्ण             –     10 किलो

लकड़ी से सव्य गति से चलाइये। बोरी से ढँक दें। वर्षा और ग्रीष्म काल में 48 घंटे छाया में रखें। शीत काल में चार दिन। सूरज की रौशनी, बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। दिन में दो बार सुबह और शाम घोलें। 48 घंटे या चार दिन बाद उसे पतले कपडे से छान कर भण्डारण कर लें।

भण्डारण

छह माह तक उसका उपयोग कर सकते हैं। सबसे उपयुक्त मिटटी के बर्तन, लोहे के ड्रम, सीमेंट का हौद आदि हैं। 200 लीटर निमास्त्र पानी मिलाये बिना खड़ी फसल पर छिड़कना है। छोटे पौधे हैं तो इतनी मात्र दो एकड़ के लिए, बड़े पौधे हैं तो एक एकड़ के लिए उपयोग में लाना है।

निमास्त्र से रस-चूसक कीट और छोटी इल्लीयाँ नियंत्रित होते हैं।

ब्रह्मास्त्र

गौमूत्र                                           –     20 लीटर

नीम के पत्तों की चटनी              –     2 किलो

अथवा

नीम के सूखे बीजों का चूर्ण         –     2 किलो

करंज के पत्तों की चटनी            –     2 किलो

सीताफल के पत्तों की चटनी     –     2 किलो

अरंडी के पत्तों की चटनी           –     2 किलो

धतूरा के पत्तों की चटनी           –     2 किलो

सभी को लकड़ी से घोलें। ढक्कन रखें। धीमी आंच पर एक उबाल आने दें। उसके बाद उसे ठंडा होने दें। दिन में दो बार घोलें। उसके बाद उसे ढँक कर रखें। वर्षा और ग्रीष्म काल में 48 घंटे छाया में रखें। शीत काल में चार दिन। सूरज की रौशनी, बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। दिन में दो बार सुबह और शाम घोलें। 48 घंटे या चार दिन बाद उसे पतले कपडे से छान कर भण्डारण कर लें।

भण्डारण और प्रयोग

छह माह तक उसका उपयोग कर सकते हैं। 100 लीटर पानी में 3 लीटर ब्रह्मास्त्र। या 15 लीटर पानी में आधा लीटर ब्रम्हास्त्र मिलाकर छिडकाव करना है। सभी रस चूसने वाले कीट और इल्लियाँ नियंत्रित होती हैं। परन्तु फल के अन्दर छुपी इल्लियाँ नियंत्रित नहीं होतीं।

आग्नेयास्त्र

गौमूत्र                                       –     20 लीटर

नीम के पत्तों की चटनी          –     2 किलो

अथवा

नीम के सूखे फलों का चूर्ण      –     2 किलो

तम्बाकू पाउडर                        –     आधा किलो

तीखी हरी मिर्च की चटनी        –     2 किलो

देसी लहसुन की चटनी             –     250 ग्राम

सभी को लकड़ी से घोलें। ढक्कन से ढँक दें। धीमी आँच पर एक उबाल लें। फिर कपडा से पकड़कर नीचे रखकर ठंडा होने दें। 48 घंटे तक ठंडा होने दें। दिन में सुबह शाम दो बार घोलें। उसके बाद उसे कपडे से छान लें। भण्डारण करें। 3 माह तक इसका उपयोग किया जा सकता है।

छिडकाव की विधि

100 लीटर पानी में 3 लीटर या 15 लीटर पानी में आधा लीटर आग्नेयास्त्र। छोटे पौधे हों तो 2 एकड़ और बड़े पौधे हों तो एक एकड़ में इतनी मात्र का उपयोग करना है।



दशपर्णी अर्क

पानी                                    –     200 लीटर

गौमूत्र                                  –     10 लीटर

ताजा गोबर                         –     2 किलो

लकड़ी से इनको घोल लें।

हल्दी पाउडर                       –     500 ग्राम

देसी अदरक की चटनी       –     500 ग्राम

हींग पाउडर                         –     10 ग्राम

इनको भी लकड़ी से ऊपर के घोल में घोल दें। बोरी से ढंकें। रात भर रखा रहने दें।

दूसरे दिन

तम्बाकू पाउडर                    –     एक किलो

तीखे हरी मिर्ची की चटनी    –    एक किलो

देसी लहसुन की चटनी        –     आधा किलो

इनको भी लकड़ी से घोल दें। बाद में ढांककर रात भर रखा रहने दें।

तीसरे दिन

नीचे लिखे पत्तों में से कोई दस प्रकार के पत्ते 2-2 किलो लें, जिनमें से पहले पांच महत्वपूर्ण हैं, उनको घोल में डालकर डुबा देना है।

नीम की छोटी-छोटी टहनियां पत्तियों सहित, सीताफल, करंज, अरंडी, धतूरा, बेलपत्र, आक, गुल्टेना, आम, अमरुद, पपीता, गिलोय, अनार, बबूल की सूखी फल्ली का चूर्ण, गुडल, अदरक, अर्जुन, गेंदा के पंचांग (तना, पत्ते, जड़ें, डाली आदि)।

बोरी से ढांककर छाया में रखें। दिन में दो बार सुबह शाम चलाना है। बारिश और धूप नहीं लगनी चाहिए। एक माह से 40 दिन तक रखें।

भण्डारण   

कपडे से छान लें। पत्तियों को अच्छे से निचोड़ लें। छह माह तक इसका उपयोग किया जा सकता है। सभी प्रकार के कीटों का नियंत्रण होता है। 100 लीटर पानी में 3-4 लीटर दशपर्णी अर्क या 15 लीटर में 500-600 मिली-लीटर अर्क की मात्रा।

नीम पेस्ट (बोडो पेस्ट का प्राकृतिक विकल्प)

पानी                                  –     50 लीटर

गोमूत्र                                –     20 लीटर

गोबर                                 –     20 किलो

नीम के पत्तों की चटनी  –     10 किलो

हल्दी पाउडर                    –     आधा किलो

सौंठ पाउडर                      –     200 ग्राम

हींग पाउडर                       –     10-20 ग्राम

इनको मिलकर अच्छे से घोलें। दिन में दो बार लकड़ी से चलाना है। 48 घंटे छाया में रखें। 48 घंटे पश्चात इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। सात दिनों के अन्दर इस्तेमाल कर लेना है। प्रथम लेपन कृतिका नक्षत्र में मई के मध्य में लगाना है। दूसरा हस्त नक्षत्र में सितम्बर के आखिरी और अक्टूबर के पहले सप्ताह में लगाना है।  तृतीय लेपन सूर्य के उत्तरायण प्रवेश काल में 21 दिसंबर से लेकर 14 जनवरी के बाच में, चतुर्थ लेपन फाल्गुन पूर्णिमा होली से लेकर चैत प्रतिपदा तक लगाना है।

फफूंद नाशक

दवा नंबर 1

पानी            –     200 लीटर

जीवामृत      –     10-20 लीटर

जीवामृत अनंतकोटि सूक्ष्म जीवाणुओं का सर्वोत्तम जामन है। साथ में यह फफूंदनाशी दवा भी है। जन्तुरोधक, विषाणुनाशक (एंटी वायरल), संजीवक (हार्मोनल) है।

दवा नंबर 2

पानी            –     200 लीटर

खट्टी छाछ    –     5 लीटर

खट्टा मठा (मही) भी सर्वोत्तम फफूंदनाशी, जन्तुरोधक, विषाणुनाशक और संजीवक है। उसमें ऐसे पिंड होते हैं जो प्रतिरोधक शक्ति बढाते हैं।

दवा नंबर 3

पांच किलो जंगल में गिरी गिरे देसी गाय के कंडे (उपले) को बारीक करें। कपडे में उसकी पोटली बांधें। रस्सी से उसे उसे 200 लीटर पानी में लटका दें। 24 घंटे तक रखने के बाद, जब पानी ताम्र वर्णीय हो जाये, पोटली बाहर निकाल कर निचोड़ लें। तीन बार उसे डुबाये और निचोड़ें। कपडे से छान लें और 48 घंटे के अन्दर छिडकाव करें।

दवा नंबर 4

एक बर्तन में दो लीटर पानी लें। उसमें 200 ग्राम सौंठ पाउडर घोलें। ढंककर उसे उबालें। उबल जाने के बाद उसे नीचे उतारें और ठंडा होने दें। दूसरे बर्तन में दो लीटर दूध लें। उसे भी ढंककर कम आंच पर उबाल लें। एक उबाल के पश्चात उसे ठंडा होने दें। चम्मच से मलाई निकाल लें।

200 लीटर पानी में सौंठ का अर्क डालें। मलाई रहित दूध भी उसमें डाल दें। घोलकर उसे बोरी से ढँक कर रखें। दो घंटे बाद कपडे से छान लें। 24 घंटे के अन्दर छिडकाव करें।

राम बाण दवा

पानी           –     200 लीटर

जीवामृत     –     15 लीटर (कपडे से छाना हुआ)

खट्टा मठा    –     5 लीटर (8-10 दिन पुराना)

इन सभी को मिलाना है।  कपडे से छानकर तुरंत उपयोग में लाना है।

दवाओं का छिडकाव कब करना है

फसल और फलों के दैनिक निरीक्षण के दौरान जिस दिन पत्तों के पिछले हिस्सों पर धूप में कीटों के अंडे या कीट दिखाई दें तुरंत कीटनाशक दवाओं के छिडकाव करना है। अगर कीटों के अण्डों या कीट दिखाई न दें तो दवा नहीं छिड़कना है।

फफूंदनाशक का छिडकाव कब करना है

दैनिक निरीक्षण के दौरान जिस दिन पत्तों के अग्र या किनारे छोटे छोटे, लाल, पीले, काले, धब्बे, दिखाई दें, समझ लीजिये फफूंद जंतु आ गए हैं। तुरंत छिडकाव करना है। धब्बे दिखाई न दें तो छिडकाव नहीं करना है।

 



जीवामृत, घन-जीवामृत और बीजामृत बनाने और उपयोग करने की विधि

जीवामृत

जीवामृत अनंतकोटी उपयुक्त जीवाणुओं का सर्वोच्च जामन है। ठीक वैसे ही जैसे हमें दूध से दही ज़माने के लिए थोड़े से दही की जरुरत पड़ती है।

एक एकड़ खेती के लिए

पानी                                                    –     200 लीटर

देसी गाय का मूत्र                               –     5-10 लीटर (जितना पुराना उतना अच्छा)

देसी गाय का गोबर                            –     10 किलो

इन तीनों को एक ड्रम में डालकर घड़ी की सुई की दिशा में लकड़ी से चलाकर मिलाना है।

गुड़ (काला सबसे अच्छा)                   –     एक किलो (पानी में घोलकर मिलाना है)

गन्ने का रस                                       –     चार लीटर (अगर गुड़ न हो)

मीठे फलों का गूदा                              –     एक किलो (अगर गुड़ न हो)

गन्ने के छोटे छोटे टुकड़े                    –     10 किलो (अगर गुड़ न हो)

बेसन                                                   –     एक किलो

पीपल / बरगद के नीचे की मिटटी    –     एक मुट्ठी

इन सभी को मिला दें। बोरी से ढँक दें।  दिन में दो बार सुबह शाम 1-2 मिनट के लिए चलाना है। सातवें दिन से 12वें दिन तक छिडकाव से सर्वोत्तम परिणाम आते हैं।

कितना डालना है – 200 से 400 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ महीने में एक या दो बार डालना है।

विधि –       सिंचाई के पानी के साथ, सीधा भूमि के ऊपर दो पौधों के बीच मे, खड़ी फसल पर छिडकाव

घन-जीवामृत

 एक एकड़ की मात्रा

सूखा छाना हुआ गोबर खाद  –     200 किलो

जीवामृत                                 –     10% यानी 20 लीटर छिड़ककर मिलायें

छाया में ढेर लगा दें। बारिश और धूप नहीं पड़नी चाहिए। शीत काल में चार दिन, ग्रीष्म और वर्षा काल में 4 दिन रखें। उसके बाद उसे धूप में सुखायें। दिन में 2-3 बार उसे ऊपर नीचे करें ताकि सभी कणों को धूप मिल सके।

सूखने के पश्चात उसे लकड़ी की मुगरी से कूट कर बारीक करें। उसे छान लें। जूट की बोरी में भरकर रखें। एक वर्ष तक इस भण्डारण करके उपयोग में लाया जा सकता है।



गोबर गैस स्लरी से बना घन-जीवामृत

गोबर गैस स्लरी (सुखाकर)   –     150 किलो

देसी गाय का गोबर                –     50 किलो

जीवामृत                                 –     2 लीटर

गुड़                                           –     एक किलो

बेसन                                       –     एक किलो

फावड़े से मिलकर छाया में कम से कम 24 घंटे के लिए ढेर लगाना है। सूरज की रौशनी और बारिश का पानी नहीं पड़ना चाहिए। शीत काल में चार दिन, ग्रीष्म और वर्षा काल में 4 दिन रखें। उसके बाद उसे धूप में सुखायें। दिन में 2-3 बार उसे ऊपर नीचे करें ताकि सभी कणों को धूप मिल सके।

उपयोग की विधि – खेत की जोताई के समय 200 किलो घन-जीवामृत अंतिम जोताई के साथ मिटटी में मिलाना है। बारानी यानी असिंचित खेती में 400 किलो प्रति एकड़ सम मात्र में खेत की मिटटी में मिला दें।

बूस्टर डोज़ – फसल जब फूलों की स्थिति में हो, उस समय प्रति एकड़ 100 किलो घन-जीवामृत डाल दें। सिंचित क्षेत्र में जितना प्रभाव जीवामृत देता है, उतना ही प्रभाव असिंचित क्षेत्र में घन-जीवामृत देता है।

बीजामृत

क्यों बीजों का बीजामृत से संस्कारित करना जरुरी है

हवा में नमी की मात्र बढ़ने पर नुक्सान करने वाले फफूंद और जंतु विशाल मात्रा में फ़ैल जाते हैं। जो बीजों पर भी चिपक जाते हैं। अगर इन्हें उपचारित या संस्कारित नहीं किया गया तो ये बीजों के साथ मिटटी में जाकर अपनी संख्या बढाते हैं। जड़ों में घुसकर पूरे पौधे में फ़ैल जाते हैं। सारे पौधे बीमार ग्रस्त हो जाते हैं। इन्हें ही जड़ों से फैलने वाली बीमारियाँ कहते हैं। इसे रोकने के लिए ही बीज का संस्करण या उपचार जरुरी है।

100 किलो बीज संस्करण के लिए

पानी                          –     20 लीटर

देसी गाय का मूत्र      –     5 लीटर

देसी गाय का गोबर   –     5 किलो

जीवाणु मिट्टी             –     एक मुट्ठी

पानी में घोला चूना    –     50 ग्राम

लकड़ी से सव्य गति से घोलना है। बोरी से ढँककर रखना है। रात भर छाया में रखना है। सुबह एक बार और घोलकर बीज संस्करण करना है।

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