भारत में डेढ़ लाख से ज्यादा स्कूली बच्चे बने ‘सागर-मित्र’ – अमेरिका और अन्य देशों को सिखा रहे प्लास्टिक का अनुशासन

पिछले बीस सालो में प्लास्टिक का निर्माण और उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। जीवन के हर आयाम में प्लास्टिक का प्रवेश हो गया है। प्लास्टिक खनिज तेल (crude oil) से बनता है। हवाई जहाज ईंधन, पेट्रोल, केरोसिन, डीजल इत्यादि को खनिज तेल से निकालने के बाद बचे हुए तेल से हाइड्रो-कार्बन अलग करके उससे प्लास्टिक बनता है।

खाने की वस्तु, औषधि और अन्य नष्वर पदार्थो को प्लास्टिक जल, हवा और मैले के स्पर्श से बचाता है, सुरक्षित रखता है। इसीलिए इसका इस्तेमाल बढ़ता गया है।

सारे देश मिलकर हमारी पृथ्वी के समुन्दरो में हर साल अस्सी लाख टन प्लास्टिक कचरा फेंकते है। इस सारे प्लास्टिक की मिट्टी होती ही नहीं। उदाहरण के लिए, बिसलेरी बोतल के पारदर्शक प्लास्टिक का ३०० साल के बाद चूरा होता है। पर इन प्लास्टिक के nano-particles (अदृश्य कणो) की मिटटी नहीं बनती। उसी बोतल के ढक्कन के ७०० साल बाद nano-particles (अदृश्य कण) बनते है – और इन कणो की भी मिटटी नहीं बनती।

प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पहुँच रहे हैं हमारे पेट और खून में

आज सुबह सोकर उठने के बाद प्लास्टिक के ब्रश से साफ़ किये जाने वाले दांत की पहली दिनचर्या से लेकर, टिफ़िन, पानी की बोतल, थाली, प्लेट, ग्लास, कप, कटोरी, खाने के तेल, आदि के माध्यम से प्लास्टिक के बारीक कण हमारे पेट, खून, फेंफडों सहित अन्य अंदरूनी अंगों में जाकर इकठ्ठा हो रहे हैं जो बाद में भयावह कैंसर का रूप लेते हैं।

सवाल यह बनता है के जो ८० लाख टन प्लास्टिक हर साल समुन्दर में जाता है – उसके कितने नैनो पार्टिकल बनेंगे? यह प्लास्टिक कचरे के नैनो-पार्टिकल घातक और विध्वंसक है। एक दूसरे से घर्षण होते ही इनमे static-electricity (विद्युत्-चुम्बकीय-शक्ति) निर्माण होती है। इर्द गिर्द के कीटक-नाशक के कण और रासायनिक-प्रदुषण के कण इस नैनो-पार्टिकल की ओर आकर्षित होकर उसे चिपक जाते है। इसलिए इस तरह के प्लास्टिक चूरे को pollution-magnifier याने की प्रदुषण-बढाने-वाला कह सकते है।



यही विद्युत्-चुम्बकीय-शक्ति-संक्रमित कण इर्द गिर्द के एक-पेशीय जल-वनस्पति (phyto-plankton) की ओर आकर्षित होकर उसे जा कर टकराते है और उसके cellulose-cell-membrane में छेद करते है, जिससे की वह जल-वनस्पति नष्ट होती है। यही phyto-plankton एक ऐसी हरियाली है जो पृथ्वी के जीवसृष्टि को आधा (५०%) प्राणवायु  देती है। वैसे ज़मीन के पेड़ बाकि आधा (५०%) प्राण वायु देते है।

प्लास्टिक की कुल्हाड़ी

लोहे की कुल्हाड़ी से हम भू-हरियाली को नष्ट करते आये है। अब प्लास्टिक की भी हमने जैसे कुल्हाड़ी बना ली है जिससे हम जल-हरियाली को नष्ट करने निकले है। लोहे की कुल्हाड़ी सब नहीं चलाते। प्लास्टिक की कुल्हाड़ी हर एक इंसान चलाता है। अब केवल पेड़ बचाओ कहने से काम नहीं बनेगा ‘प्लास्टिक-कुल्हाड़ी रुकाओ जल-हरियाली बचाओ’ ऐसा नारा बनाकर बच्चों से लेकर बडो तक सबको सीखना और सिखाना पड़ेगा।

जितना ज़रूरी है के ज़मीन-की-हरियाली को बचाये, उससे भी ज़्यादा ज़रुरत है के हम जल-हरियाली को बचाये।

अदृश्य-कण बनने से पहले प्लास्टिक कचरे के छोटे छोटे पर दृश्य टुकड़े बनते है। यह समुन्दर के जल में तैरते है। ऐसे लटके रहते है की मछली इन्हे आहार समझकर निगल जाती है, और उसकी मौत होती है। पंछी भी ऐसे टुकड़ो को खा लेते है और मर जाते है।

जब जल पर प्लास्टिक कचरे का एक पटल आता है तो सूरज की किरण इस पटल को छेद कर जल के भीतर पहुँच नहीं सकती। सूर्य-किरणों की सौर-ऊर्जा ही जल-वनस्पति तक न पहुंचे तो हरित द्रव्य से चलता हुआ प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis process catalyzed by chlorophyll) ही नहीं हो पाता और वह जल-वनस्पति नष्ट हो जाती है।

प्लास्टिक के पहाड़ और द्वीप

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने अक्टूबर २०१६ में घोषित किया है के दुनिया के पांच सागरों की २५% मछलियों के भीतर प्लास्टिक टुकड़े मिलते है। लाखों मछली और पंछी हमने फेका हुआ प्लास्टिक कचरा खाकर मर रहे है। प्रशांत महासागर के बीचो बीच अमेरिका देश के मिडवे द्वीप पर हर साल दस लाख अल्बाट्रोस पंछी जनम लेते है और हर साल इनमेसे चार लाख पंछी प्लास्टिक खाकर मरते है यह केवल एक उदहारण है।

शहर के गटर और नालों मे प्लास्टिक जम जाता है और अति वर्षा होने पर इस प्लास्टिक के कारण शहर में अचानक बाढ़ आती है। मिठी नदी मुंबई से लेकर अगस्त २०१८ में केरल की नदियों में बाढ़ आने के पीछे प्लास्टिक प्रदुषण यह भी एक कारण था। उपयुक्त, परन्तु विनाशक भी, ऐसे प्लास्टिक के बारे में अभ्यास करना अत्यावश्यक है। इस प्लास्टिक ने सागर को ही घायल कर दिया है।

अमरीका की नदियों से बहकर आया हुआ प्लास्टिक प्रशांत महासागर में (२००० x ८००) १६,००,००० चौरस किलोमीटर (वर्ग किलोमीटर) तक फैला है। यह प्लास्टिक कचरे का तैरता हुआ द्वीप ३० फ़ीट गहरा है। ऐसे अजस्त्र आकार के प्लास्टिक कचरे के तैरते हुए द्वीप पांचो सागर में है और यहां भी सारे पंछी और मछलियां और जल-वनस्पति संकट में है।

खाने की चीज़े, औषधि और कई नश्वर पदार्थों को प्लास्टिक का आवरण हवा, पानी और धूल से सुरक्षित रखता है, इसलिए इसका इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है। अमरीका का प्लास्टिक उत्पादन भारत के कुल उत्पादन से तीस गुना ज्यादा है। चीन का प्लास्टिक उत्पादन भी भारत के कुल उत्पादन से तीस गुना ज्यादा है।

आज की अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में अमरीका ने घोषित किया है के वह उनका प्लास्टिक उत्पादन दुगुना करने जा रहे है – क्योंकि उनका शेल-ऑइल (shale-oil) का उत्पादन बढ़ गया है। यह प्लास्टिक अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रवेश कर जाएंगे तो प्लास्टिक प्रदुषण का संकट और बढेंगा।

इस परिस्थिति में सुधार लाकर प्लास्टिक का उपयोग कम करने की खोज में कुछ हद तक प्लास्टिक पर बंदी लायी गयी है पर यह इस समस्या का हल नहीं है। उदाहरण, पुणे शहर हर रोज २०० टन प्लास्टिक कचरा निर्माण करता है। अगस्त २०१८ में महाराष्ट्र शासन ने सिंगल-यूज़ (Single-Use) प्लास्टिक के निर्माण, भण्डारण, परिवहन और बिक्री पर प्रतिबन्ध लाया।

यदि पुणे शहर में यह प्रतिबन्ध १००% प्रतिशत लागु होता तो हर रोज़ के २०० टन प्लास्टिक कचरे में से केवल ४० टन प्रदुषण कम होता। बाकि १६० टन कचरा प्रतिबंधित न होने के कारण उसको फेकने की, और उससे हर रोज़ नया प्रदुषण निर्माण होने की, प्रक्रिया जारी रहती। प्रतिबन्ध का निर्णय बुरा नहीं पर ऐसा निर्णय इस समस्या का कायमस्वरूपी हल नहीं हो सकता।

शासन निर्णय की अकार्यक्षमता को देखते हुए प्लास्टिक कचरा प्रबंधन का और एक पर्याय हमारे आगे आता है। आत्माशिस्त का पर्याय।



प्लास्टिक की रद्दी

यदि हर घर, हर दुकान, हर होटल, हर मॉल और हर संस्था ने अपना अपना प्लास्टिक कचरा, कागज़ की रद्दी की तरह प्लास्टिक की रद्दी के रूप में इकठ्ठा किया और हर महीना रीसायकल करने वाले कंपनी/संस्था/कबाड़ीवाले को दिया तो Segregate-Recollect-Recycle (वर्गीकरण करना-इकठ्ठा करना-पुनर्निर्माण करना) की श्रृंखला बन जाती है। शासन के प्रयत्नों के साथ वैयक्तिक और सामूहिक आत्म-अनुशासन भी जुड़ जाता है।

उदाहरण, पुणे शहर में दी अकाडेमिक अडवायजर्स(The Academic Advisors) इस NGO (स्वयंसेवी संस्था) ने उसके सागरमित्र अभियानकार्यक्रम के अंतर्गत २०११ में १५० स्कूल छात्रों को घर में स्वच्छसूखाऔरखाली प्लास्टिकरद्दी इकठ्ठा करने का प्रशिक्षण दिया। अब २०१८ में पुणे (१,३६,०००) और जलगाव (२०,०००) मिलकर ऐसे ,५०,००० से ज्यादा सागरमित्र स्वयंसेवी स्कूल-छात्र प्लास्टिक कचरा इकठ्ठा करने के अभियान में योगदानकर्ता है।

यही डेढ़लाख छात्र अपने घर के और तीन लोगों को भी प्लास्टिक रद्दी इकठ्ठा करने में लगा देते है। यह सब केवल घर का प्लास्टिक-कचरा उठाते है। छात्रों को कभी भी घर के बहार का प्लास्टिक उठाने का शिक्षण सागरमित्र अभियान नहीं देता। रस्ते पर और या रस्ते के इर्द गिर्द जो प्लास्टिक पड़ा होता है वह छात्र उठाने जाए तो उन्हें कांच का टुकड़ा, किला, इंजेक्शन की सुई, गाय-भैस का सींग, कुत्ते के दांत – ऐसे किसी भी तरीके से जख्म हो सकती है। लड़के राजपुत्र है। लडकियां राजकुमारी है।

बच्चों को नेतृत्व के संस्कार सिखाने वाला अभियान

हम बड़े लोगों की औकात नहीं के हम छोटे बच्चों से घर के बहार का प्लास्टिक उठवाये। क्या कोई भी माँ और बाप अपने छोटे बच्चों से घर के बहार का वर्तमान पत्र उठाकर घर की कागज़ की रद्दी में रखना सिखाते है? वही नियम प्लास्टिक की रद्दी के लिए लागु है। यह छात्र इस तरीके से कम उम्र में ही प्रत्यक्ष कृति के आधार से आत्म-अनुशासन सीख लेते है और कार्य में सुरक्षित रहना भी सीखते है – तो इससे इस अगली पीढी पर ज़िम्मेदार नेतृत्व के संस्कार भी होते है। इसका एक उदाहरण आगे प्रस्तुत है।

ओमकार गाणु वीं कक्षा में सागरमित्र का सदस्य बना। हर महीना २०० से ३०० gm प्लास्टिक कचरा यह घर से स्कूल लाने लगा। स्कुल के 5०० छात्र करीब करीब २५ किलो प्लास्टिक हर महीना लाने लगे थे। सागरमित्र से जुडी प्लास्टिक कंपनी यह २५ किलो प्लास्टिक कचरा खरीद लेती और फिर इसको रीसायकल करती। ओमकार ने दो साल में इसका गणित भी जान लिया।

() किलो प्लास्टिक कचरा १५० किलो गीले जैविक कचरे को ख़राब करता है

() किलो प्लास्टिक कचरे का चुरा वर्ग किलोमीटर समंदर के पानी को ख़राब करता है जिससे की वहां की मछलियों का जीवन खतरे में आता है

Think Globally, Act Personally

ओमकार जब कॉलेज में गया तब ११ वि और १२ वि में उसने सागरमित्र के लिए ९ और स्कूल जोड़ दिए – जिनमे ९००० छात्र थे। जो लड़का २ साल में हर साल ५ किलो प्लास्टिक घर से स्कूल लाता था उसने २ साल में ९००० छात्र जोड़ दिए। यही है सागरमित्र के भीतर छिपा हुआ निजी जिम्मेदारी और नेतृत्व गुणों का प्रशिक्षण।

इसे अंग्रेजी में सागरमित्र अभियान के प्रमुख संचालक विनोद बोधनकर कहते है ‘Think Globally, Act Personally’ याने की ‘दुनिया का सर्व-व्यापक अभ्यास करो, फिर उस हिसाबसे खुदके हांथो से प्रयास करो’। जब तक ज़िम्मेदारी और नेतृत्व का प्रशिक्षण खुद के हांथों के कर्तुत्व और आज और अभी के निजी कर्तृत्व के करने तक नहीं पहुँचता है तब तक वह सही परिवर्तन का प्रशिक्षण नहीं है।

एक छात्र सागरमित्र का सदस्य बनने के बाद पहले ही दिन घर में प्लास्टिक कचरा उठा रहा था। उसके पिताजी ने कहा, क्यों कचरा उठाते हो। यह गन्दा काम है। छात्र ने कहा ‘पिताजी मुझे रोकना नहीं और टोकना नहीं। मै अहिंसा का काम कर रहा हूँ यदि मै साल भर में ५ किलो प्लास्टिक कचरा घर से उठा लूँ और स्कूल भेज दूँ तो १ वर्ग किलोमीटर समंदर का पानी और उसके भीतर की मछलियां बच जाएगी’।

पिताजी ने हमें फ़ोन किया और कहने लगे मै भी मेरी बिज़नेस का प्लास्टिक कचरा सागरमित्र को भेजना चाहता हूँ आज यह महाशय उनके अभिरुचि मॉल से हर महीना टन (२००० किलो) प्लास्टिक कचरा भेजते है।

इस तरीके से भी सागरमित्र छात्र समाज-परिवर्तन हेतु नेतृत्व के गुण दिखा रहे है। जब एक छात्र ९००० विद्यार्थियों को जोड़ता है और एक और छात्र सागरमित्र अभियान के भीतर के अहिंसा संस्कार का समर्थन करते हुए उसके परिवार में परिवर्तन ला कर पिताजी के मॉल से हर महीना २००० किलो प्लास्टिक कचरा इकठ्ठा करता-करवाता है – तो १,३६,००० छात्रों से क्या अपेक्षा कर सकते है?

ओशन हीरो (Ocean Hero)

ऐसे उदाहरणों को देखकर ‘5 Gyres Institute इस, प्लास्टिक कचरा और समंदर के बारे में रिसर्च करने वाली प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने सागरमित्र के सब छात्रों को ‘OCEAN HERO यह सन्मान २०१५ में दिया है। ओशन हीरो याने की सागर-नायक।

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन में शासन के प्रयत्नों के साथ सागरमित्र जैसे आत्म अनुशासन केंद्रित नेतृत्वगुण विकास लोग सहभाग कार्यक्रमों को भी विकसित करना पड़ेगा।

आज सागरमित्र अभियान को त्रिपुरा राज्य शासन के ,००,००० छात्रों के प्रशिक्षण करने के लिए आमंत्रित किया है। महाराष्ट्र शासन का तीन ज़िलों में १५००० स्कूल में ५० लाख छात्रों के प्रशिक्षण का कार्यक्रम रचने के लिए खत आया है। टाटा मोटर्स ने जमशेदपुर को बुलाया है। कर्णाटक के वाल्मी ने धारवाड़ बुलाया है। तमिलनाड के मदुरै में सागरमित्र जलबिरादरी के जल जान जोड़ो कार्यक्रम का हिस्सा बन कर पहुँच गया है। अनिकेत लोहिया की मानवलोक संस्था इसे मराठवाड़ा के गाँवों में ले जा रही है।

डॉक्टर नीलेश हेड़ा की संवर्धन संस्था इसे विदर्भ के लिए बुला रही है। ‘राजेश पंडित की ‘नमामि गोदा अभियान इसे नाशिक में बुला रही है। सागरमित्र अभियान अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में २ स्कूल में चलता है। मोरक्को देश के बेनी मेल्लाल गाँव में भी सागरमित्र अभियान का टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम हो गया है।

आज जलगाव शहर में सागरमित्र अभियान ४० स्कूल के २५००० छात्र चलाते है।

कोटा राजस्थान में ६ स्कूल के २००० छात्र सागरमित्र है।

२०२३ तक केवल पुणे शहर में सागरमित्र अभियान के भीतर १२ लाख छात्र होंगे।

कैसे जुड़ें सागर-अभियान से

हर माह भीकमपुरा में तरुण भारत आश्रम द्वारा संचालित नदी घाटी पुनर्जीवन और नदी घाटी प्रबंधन के ३ दिन के प्रशिक्षण में अब जल-बिरादरी के जल-जन-जोड़ो अभियान सन्दर्भ के भीतर सागर-मित्र अभियान सिखाया जाता है। यहाँ से भी सागरमित्र अभियान अपने शहर या गांव में कैसे शुरू किया जाये यह प्रक्रिया की शुरुवात होती है।  अब नरसिंहपुर के ‘ब्रजेश पटेल’ इस अभियान को माँ नर्मदा नदी घाटी में शुरू कर रहे हैं।

यदि कोई भी प्रशिक्षणार्थी सागरमित्र अभियान अपने गाँव, शहर या नदी घाटी में प्रस्थापित करना चाहता हो तो सागरमित्र अभियान उसके बारे में दीर्घ मार्गदर्शन करने को सदा सेवा में हाज़िर है। सबसे महत्व की बात यह होगी के अपने गाँव या शहर में प्लास्टिक कचरा कौन उठाता है और कौन इसे रीसायकल करता है यह ढूंढ़ना पड़ेगा।

स्कूल से कौन उठाएगा बच्चों द्वारा लाया गया प्लास्टिक

केवल स्कूल के छात्र या नागरिकों ने प्लास्टिक कचरा इकठ्ठा करने से बात नहीं बनती। इकठ्ठा किया हुआ प्लास्टिक कचरा कौन खरीदेगा और स्कूल से फॉक्ट्री तक कौन पहुचायेगा, यह सागरमित्र अभियान का पहला और ९९% महत्वपूर्ण कार्य है। कई लोग सागरमित्र अभियान को जल्दबाज़ी में शुरू करना चाहते है। उनको लगता है के सागरमित्र अभियान का पीपीटी / PPT (संगणकीय चित्र-श्रृंखला) लेकर बस बच्चों से बात करनी है। यह तो केवल १% सागरमित्र की बात हुई।

बच्चों के लाये हुए प्लास्टिक कचरे को उठवाकर प्लास्टिक रीसायकल की फैक्ट्री तक पहूँचाना यह  ९९% कार्यभार है। इसको सोचकर ही सागरमित्र के शिबिर में उपस्थित प्रवक्ता / प्रशिक्षक के साथ इसकी दीर्घ चर्चा होना आवश्यक है। अल्प-दृष्टि से कार्य आरम्भ करना यह बच्चों पर नाइंसाफी होगी।

यदि छात्र एक महीना परिश्रम के बाद समझों के २५ किलो प्लास्टिक कचरा स्कूल को लाते है – तब यदि उस प्लास्टिक कचरे को रीसायकल के लिए ले जाने की व्यवस्था न हो तो यह सागरमित्र अभियान के स्थानिक प्रायोजक और संचालक का गंभीर अपयश होता है। सागरमित्र अभियान के पीपीटी / PPT  से ज्यादा प्लास्टिक कचरा उठानेवाले को इस कार्य से जोड़ना यह सबसे महत्व की पूर्व-तैयारी है।

शून्य लागत प्राकृतिक खेती (सुभाष पालेकर) का प्लास्टिक फ्री प्रशिक्षण शिविर

पिछले दिनों 21 सितम्बर से 26 सितम्बर तक देश और विदेश के किसानों, समाजसेवी संगठनों के प्रतिनिधि, प्राकृतिक और जैविक खेती में रूचि रखने वाले लगभग 1500 लोग 6 दिन के आवासीय प्रशिक्षण शिविर, झाँसी में सम्मिलित हुए, जहाँ अभियान के संचालकों ने इस शिविर को ‘प्लास्टिक फ्री’ रखने के अति प्रशंसनीय पहल की जिसे सभी के द्वारा बहुत सराहा गया।

सभी प्रशिक्षणार्थियों के साथ साथ सम्मिलित सभी पत्रकारों, विधायकगण, प्रशासनिक अधिकारियों को एक कपडे के बैग के साथ खंड वाली थाली, ग्लास और चम्मच प्रदान की गयी जिसका निजी उपयोग लोगों ने चाय, नाश्ता, दोपहर के भोजन, शाम के स्वल्पाहार, और रात्रि के भोजन के लिए किया।

अक्सर ऐसे समारोह और कार्यक्रमों में खाने-पीने के लिए प्लास्टिक के डिस्पोजल, ग्लास, प्लेट, थाली, कप, कटोरी, चम्मच आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसका एक कारण इनका बहुत सस्ता और सुलभता से उपलब्ध हो जाना होता है। परन्तु, यही सहूलियत स्वयं के स्वास्थ्य, जमीन, पर्यावरण, वायु, जल आदि की प्रदूषण के लिए बहुत घातक सिद्ध होती है।

शिविर की इस पहल का सभी ने दिल से स्वागत किया। उम्मीद है देश के विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक, जातीय संगठन, व्यक्ति और समूह इस तरह की पहल करके इसे अपने संस्कारों में सम्मिलित कर न केवल स्वयं के बल्कि धरती, वायु, जल, नदियों, शहरों, गांवों आदि के स्वास्थ्य और स्वच्छता का भी ख्याल रखेंगे।

सागरमित्र अभियान से जुड़ने और उसे अपने क्षेत्र में शुरू करने के लिए श्री विनोद बोधनकर जी या उनके द्वारा प्रशिक्षित प्रशिक्षकों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम में सम्मिल्लित होना आवश्यक है। प्रशिक्षण के पश्चात सागरमित्रा अभियान से नॉलेज पार्टनर के रूप में औपचारिक अनुबंध आवश्यक है।

विनोद बोधनकर

सेक्रेटरीदी एकेडेमिक अडवायज़र्स (TAA)

सहासंचालक, TAA – सागरमित्र अभियान

९८५०२३००६४

ईमेल – parvatara@gmail.com 

वेबसाइट www.sagarmitra.in

 



जैविक और प्राकृतिक कृषि में उच्च शिक्षा, करियर और रोजगार

देश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं यह सेक्टर 50 फीसद से ज्यादा आबादी को रोजगार भी उपलब्ध कराता है। इसके अलावा हाल के वर्षों में जिस तरह से कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण हुआ है, इसमें नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ा है।

पारंपरिक खेती के साथ-साथ आर्गेनिक और इनोवेटिव फार्मिंग हो रही है, उसने एग्रीकल्चर के प्रति समाज और खासकर युवाओं का नजरिया काफी हद तक बदला है। यही कारण है कि बीते कुछ समय में आईआईटी और आईआईएम से पास आउट कई युवाओं ने मल्टीनेशनल कंपनियों का जॉब छोड़कर एग्रीकल्चर और एग्रीबिज़नस की ओर रुख किया है।

इनके अलावा भी दूसरे सेक्टर्स में काम करने वाले युवा हॉर्टिकल्चर, डेरी, आर्गेनिक और पोल्ट्री फार्मिंग जैसे पेशे से जुड़ रहे हैं। उन्हें गर्व है कि वे देश और किसानों के लिए कुछ सकारात्मक कर पा रहे हैं।

मुनाफे का धंधा आर्गेनिक खेती

जैविक खेती का जिक्र तो आजकल बहुत हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि किसी को इसमें करियर बनाना है, तो वह क्या करे। गौरतलब है कि यह ऐसी खेती है, जिसमें सिंथेटिक खाद, कीटनाशक आदि जैसी चीजों के बजाय तमाम आर्गेनिक चीजें जैसे गोबर, वर्मी कम्पोस्ट, बायो फर्टिलाइजरस, क्रॉप रोटेशन तकनीक आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

कम जमीन में कम लागत में इस तरीके से पारंपरिक खेती के मुकाबले कहीं ज्यादा उत्पादन होता है। यह तरीका फसलों में जरुरी पोषक तत्वों को संरक्षित रखता है और नुकसानदेह केमिकल्स से दूर रखता है। साथ ही यह पानी भी बचाता है और जमीन को लम्बे समय तक उपजाऊ बनाये रखता है। यह पर्यावरण संतुलन बनाये रखने में मददगार है।

कैसे करें शुरुआत

अगर आपको आर्गेनिक खेती शुरू करनी है, तो सबसे पहले आपको इसका प्रोजेक्ट या ब्लू प्रिंट बनाना होगा। यह तय करना होगा की कितनी जमीन पर यह खेती करेंगे। जमीन की लोकेशन क्या है? जमीन किस फसल के लिए अच्छी है? आपका बजट कितना है? यह प्रोजेक्ट किसी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट से बनवा सकते हैं। इसके बाद आपको फॉर्म 1 ए-1, 1 ए-3, 1 जी और फॉर्म 11 भरकर रजिस्ट्रेशन फीस के साथ अपने राज्य के डिपार्टमेंट ऑफ़ आर्गेनिक सर्टिफिकेशन में जमा करना होगा।

सरकार देती है सब्सिडी

कृषि वैज्ञानिक आपकी जमीन की जांच करेंगे और यह तय करेंगे कि इसकी मिट्टी किस तरह की फसल के लिए अच्छी है। इसके बाद आपका प्रोजेक्ट कृषि विभाग में पास होने के लिए भेज दिया जायेगा। आर्गेनिक फार्मिंग के लिए तकरीबन हर राज्य में सरकार 80 से 90 फीसद तक सब्सिडी देती है।

मतलब यह आपको पूरे प्रोजेक्ट में 10 से 20 फीसद ही इन्वेस्ट करना होगा। प्रोजेक्ट पास होने के बाद आर्गेनिक फार्मिंग टेक्निक वाली कम्पनियाँ सेटअप लगाने के लिए आपसे खुद संपर्क करती हैं। सरकार से मिले पैसों से ये कम्पनियाँ आपकी जमीन पर ग्रीन हाउस और आर्गेनिक फमिंग के लिए सेटअप लगाती हैं। साथ ही आपको ट्रेनिंग भी देती हैं।



एग्रीबिजनेस

आज के समय में जो भी कंपनी किसानों के साथ बिज़नस ट्रांजेक्शन कर रही हैं, फिर चाहे वह खाद्यान्न, फल, फूल से जुड़ा हो या किसी सर्विस से, उसे एग्रीबिजनेस सेक्टर में शामिल किया जाता है। इसी तरह बीज, कीटनाशक, एग्रीकल्चर इक्विपमेंट की सप्लाई, एग्री-कंसल्टेंसी, एग्रो-प्रोडक्ट की स्टॉकिंग, फसल का बीमा कराने या खेती के लिए लोन देने का काम भी एग्रीबिजनेस के अंतर्गत आता है। एग्री-प्रोडक्शन में इन्वेस्टमेंट से लेकर उसकी मार्केटिंग तक का काम एग्री-बिज़नस कहलाता है।

भारत का एग्रीकल्चर सेक्टर आज सिर्फ अनाजों के उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें बिज़नस के अवसर भी काफी बढ़ चुके हैं। फसलों की हार्वेस्टिंग से लेकर प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन में काम करने के लिए कई सारे मौके पैदा हुए हैं।

इसके अलावा एडवांस टेक्नोलॉजी के आने से फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और फ़ूड रिटेल सेक्टर में अनेक प्रकार के रोजगार सृजित हुए हैं, उन्हें मल्टीनेशनल कंपनियों में अच्छे पे-पैकेज पर रखा जा रहा है। इसके अलावा, एग्रीकल्चर और इससे जुड़े फील्ड के क्वालिफाइड यूथ के लिए वेयरहाउस, फ़र्टिलाइज़र, पेस्टिसाइड्स, सीड और रिटेल कंपनी में तमाम तरह के विकल्प सामने आ चुके हैं।

देशव्यापी प्रोजेक्ट

सरकार की ओर से नेशनल आर्गेनिक फार्मिंग प्रोजेक्ट भी चलाया जा रहा है। इसके सेंटर की वेबसाइट www.ncof.dacnet.nic.in से आप और भी जानकारी ले सकते हैं। दिल्ली स्थित पूसा इंस्टिट्यूट से भी पूरी जानकारी और ट्रेनिंग ले सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए www.icar.org.in देख सकते हैं।

सिर्फ मानसून पर निर्भर नहीं कृषि

कृषि अब पूरी तरह से मानसून पर निर्भर नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से अगर खेती की जाये, तो फसल भी अच्छी होती है और पानी भी कम लगता है। पहले जैसे सूखे के हालात अब नहीं पैदा होते। अब बारिश के पानी का स्टोरेज भी बेहतर तरीके से किया जाता है। इससे बारिश कम होने पर भी फसलों को पर्याप्त पानी मिल जाता है।

स्वरोजगार  

एग्रीकल्चर स्वरोजगार का सबसे अच्छा साधन है। इससे अब अच्छी कमाई की जा सकती है। बहुत से प्रोफेशनल फार्मर साइंटिफिक फार्मिंग के जरिये न सिर्फ अच्छा पैसा कमा रहे हैं, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं। यही नहीं, प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों सेक्टर में एग्रीकल्चर का स्कोप तेजी से बढ़ रहा है।

पिछले दिनों विश्व के सबसे बड़े जैविक खेती थिंक टैंक इंटरनेशनल फोरम फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स तथा रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर ने संयुक्त रूप से एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की है। उनके अनुसार जैविक खेती करने वाले उत्पादकों की सबसे अधिक संख्या भारत में है। भारत में 8 लाख 35 हजार से अधिक लोग जैविक खेती कर रहे हैं। दूसरे स्थान पर मक्सिको है।

विभिन्न रिपोर्टों में वर्ष 2022 तक भारत में 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती किये जाने की सम्भावना बताई गयी है। जैविक खेती के क्षेत्र में पूर देश में अग्रणी मध्यप्रदेश में वर्ष 2001-02 में जैविक खेती का आन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक ब्लाक में एक-एक गाँव में जैविक खेती शुरू की गयी है और इन गाँवों को ‘जैविक गाँव’ का नाम दिया गया है।

कोर्सेज के लिए संस्थान

नवदान्या बीज विद्यापीठ, देहरादून (उत्तराखंड)

जवाहर लाल नेहरु कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर

निःशुल्क प्रशिक्षण

चेतना विकास स्वराज्य ट्रस्ट (स्वदेशम), ग्राम – बिहटा, तहसील सियाना, जिला बुलंदशहर (उप्र) के श्री भारत भूषण त्यागी भारतीय जैविक खेती में एक जाना पहचाना नाम हैं। उनके द्वारा प्रत्येक माह के पहले शनिवार-रविवार को जैविक खेती पर दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया जाता है। पीजीएस सर्टिफिकेशन प्रोग्राम, आर्गेनिक फार्मिंग कंसल्टेंसी आदि सेवाएं भी प्रदान करते हैं।

पिछले 20 साल से जैविक खेती करने वाले श्री त्यागी अपने परिवार सहित इस अभियान में जुटे हैं।

संपर्क सूत्र : श्री दीपक त्यागी, फ़ोन नंबर –  94100 19621, 95993 05319 पर बात करके प्रशिक्षण सम्बंधित जानकारी प्राप्त की जा सकती है।



सुभाष पालेकर शून्य बजट प्राकृतिक खेती

जाने माने भारत द्वारा पुरस्कृत पद्मश्री कृषि ऋषि  सुभाष पालेकर जी द्वारा देशभर में 6 से 12 दिवसीय शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर निःशुल्क प्रशिक्षण दिए जाते हैं। देशभर में 6 से 12 दिवसीय प्रशिक्षण दिए जाते हैं।

पुरातन काल से प्रकृति और ईश्वरीय व्यवस्था से सामंजस्य बिठाकर की जाने वाली प्राकृतिक खेती, भोजन, अनाज, जल, मानव, जमीन, वायुमंडल आदि के अस्तित्व को विदेशी और देशी षड्यंत्रकारी उद्योगपतियों, सरकारों ने हरित क्रांति की मशाल थामे रासायनिक खेती ने गहरे संकट में पहुंचा दिया है।

खाद, पोषक तत्व, कीट नियंत्रण जैसी तमाम व्यवस्था ईश्वर ने प्रकृति के माध्यम से कर रखीं थीं जिसे मानव ने अपने हाथों से नष्ट कर दिया है।

अंग्रेजों और तानाशाही विश्व सत्ता ने कहने के लिए भारत और अन्य देशों को कहने के लिए तो आज़ाद कर दिया था लेकिन देश पर अपनी तमाम शोषणकारी व्यवस्थाओं की जड़ें गहरे में जमाकर गए थे जिनको देश के स्वार्थी नेताओं और उद्योगपतियों ने अपने स्वार्थ के लिए बहुत बड़ा कर दिया है।

अंग्रेजियत ने सिर्फ हमारी भाषा और संस्कृति के साथ साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि आदि को भी विनाश के पथ पर अग्रसर किया है जिसे आज विकास के नाम से जाना जाता है। आज सब कुछ जानते हुए भी हम भोजन, जल, दूध, फल, सब्जियों आदि में सुबह, दोपहर, शाम, रात ज़हर खाने को मजबूर हैं।

देश में प्राकृतिक और ज़हर मुक्त खेती का विशाल जन-आंदोलन खड़े करने वाले सुभाष पालेकर  द्वारा किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, समाज सेवी संगठनों, जागरूक नागरिकों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को 6 से 12 दिवसीय प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिए जाते हैं। देश भर में उन्होंने विभिन्न किसानों के माध्यम से प्राकृतिक खेती के हजारों मॉडल स्थापित किये हैं, जिनके बारे में व्यवाहारिक प्रशिक्षण, ज्ञान और भ्रमण आदि भी समय समय पर कराये जाते हैं।

किसानों को अपनी फसल बिचौलियों को न बेचकर स्वयं उसका प्रसंस्करण कर सीधे उपभाक्ताओं को बेचने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया जाता है।

इच्छुक व्यक्ति, किसान, विद्यार्थी, सामाजिक संगठन आदि उनके प्रशिक्षण में सम्मिलित होकर प्राकृतिक और ज़हर मुक्त खेती सीख सकते हैं। फेसबुक पर उनका पेज है जिसे फॉलो करने पर उनके द्वारा आगामी सभी प्रशिक्षण आदि की जानकारी दी जाती है।

ज्यादा जानकारी के लिए इस अभियान से जुड़े कुछ मुख्य पदाधिकारियों से संपर्क किया जा सकता है, जिनके नाम और नंबर नीचे दिए जा रहे हैं।

श्री गोपाल उपाध्याय – 7376078725, 9519524776

श्री श्याम बिहारी गुप्ता – 9889196787

श्री अमित पालेकर – 9673162240

श्री अमोल पालेकर – 9881646930

वेबसाइट : www.palekarzerobudgetspiritualfarming.org

ईमेल – palekarsubhash@yahoo.com, tejomit@gmail.com, amolspalekar@gmail.com