प्लांट ब्रीडिंग और जेनेटिक्स में उच्च शिक्षा और करियर

कृषि उत्पादन को बढ़ाने में प्लांट ब्रीडिंग की भूमिका महत्वपूर्ण है। अब इसे सरकारी संस्थानोंव्यवसायिक उद्यमों द्वारा विश्व भर में अपनाया जा रहा है। इसलिए इस फील्ड में करियर बनाने के बढ़िया अवसर सामने आते जा रहे हैं।

हमारे देश की आधी से ज्यादा जनसँख्या कृषि कार्य में संलग्न है। वर्तमान समय में हम लगभग 260 मिलियन टन खादान्य उत्पन्न करते हैं। यद्यपि यह उत्पादन वर्तमान में हमारे देश की जनसँख्या के लिए पर्याप्त है, परन्तु वर्ष 2025  तक हमारी खादान्य मांग बहुत अधिक बढ़ जाएगी क्योंकि हमारी जनसँख्या बहुत अधिक गति से बढ़ रही है।

इसलिए प्लांट ब्रीडिंग जैसी आधुनिक सोच के माध्यम से हमारे देश में फसल सुधार प्रासंगिक है। प्लांट ब्रीडिंग के मुख्य लक्ष्य पैदावार सुधार, गुणवत्ता मापदंड, बायोटिक तथा एबायोटिक रेजिस्टेंस हैं ताकि सभी अनुकूल परिवर्तनों से उत्पादन में वृद्धि हो। कृषि उत्पादन को बढाने में प्लांट ब्रीडिंग की भूमिका महत्वपूर्ण है। अब तो इसे सरकारी संस्थानों व व्यवसायिक उद्यमों द्वारा विश्व भर में अपनाया जा रहा है।



गेंहूँ, चावल की उच्च पैदावार वाली श्रेष्ठ किस्में प्लांट ब्रीडिंग की जानी मानी उपलब्धियां हैं, जिनसे हमारे देश में हरित क्रांति आई और देश खादान्य उत्पादन में आत्मनिर्भर हुआ।

जेनेटिक्स में अवसर

प्लांट ब्रीडिंग की तरह जेनेटिक्स भी एक ऐसा महत्वपूर्ण विषय है, जो जीव-जंतु तथा पेड़ पौधों की उत्पत्ति से लेकर उसके विकास और अन्य आयामों की विस्तृत व सही जानकारी देता है। मगर यह काम किसी पहेली से कम नहीं है। यदि आप इन पहेलियों को सुलझाने में गहरी रूचि रखते हैं, तो जेनेटिक्स में आप सफल करियर बना सकते हैं।

जेनेटिक्स में इंजिनियर और विज्ञानी, दो करियर रास्ते होते हैं, जिन पर आप कदम बाधा सकते हैं। इंजीनियर विभिन्न जीन के समूहों और उनके गुणों के बारे में अनुसन्धान व विश्लेषण करते हैं तथा उनका अध्ययन करते हैं।

इसके अलावा विभिन्न जीवों तथा जीवित प्रजातियों जैसे पौधों, पशु-पक्षियों एवं मनुष्यों में से अपने स्रोत ढूंढते हैं। वहीँ जेनेटिक विज्ञानी इस बात का अध्ययन करते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी गुण एवं व्यवहार किस प्रकार समान होते हैं और वंशानुगत विसंगतियां कैसे व क्यों उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसन्धान केवल विसंगतियों के कारणों को जानने तक ही सीमित नहीं होते, बल्कि संभावित बचाव के तरीके भी ढूँढने का कार्य जेनेटिक्स में होता है।

दसवीं से तैयारी शुरू

जेनेटिक्स साइंस के अध्ययन की तैयारियां दसवीं और बारहवीं स्तर से ही शुरू हो जाती हैं। बारहवीं स्तर पर विज्ञान विषयों के गहन अध्ययन के बाद जेनेटिक्स में भविष्य बनाने के लिए जरुरी है कि स्नातक स्तर पर जेनेटिक्स या बायोटेक्नोलॉजी विषय का चयन किया जाये।

ग्रेजुएशन के बाद जेनेटिक्स में विशिष्टता जैसे एमएससी या पीएचडी की उपाधि हासिल करने से जेनेटिक्स में बेहतरीन करियर की संभावनाएं निर्मित होती हैं। इसके अलावा वर्तमान समय में जेनेटिक्स विशेषज्ञों के लिए अनुसन्धान एवं विकास, शिक्षण, मार्केटिंग और उत्पादन के क्षेत्र में भी रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध हैं।

रोजगार की संभावनाएं

जेनेटिक्स का कोर्स करने के बाद रोजगार की बहत उज्जवल संभावनाएं मौजूद हैं। जेनेटिक्स अनुसन्धान के क्षेत्र में विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थानों में रोजगार की संभावनाएं हैं। इसके अलावा, माइक्रोबियल तकनीक संस्थान, राष्ट्रीय विज्ञान बायोकैमिकल इंजीनियरिंग अनुसन्धान व प्रक्रिया विकास केंद्र आदि कुछ सरकारी एजेंसियां हैं, जो जेनेटिक विज्ञानियों की बहुत अच्छे वेतनमान पर नियुक्ति करती हैं।



मुख्य तौर पर जेनेटिक्स विज्ञानियों के अनुसंधानों और विकसित उत्पादों का लाभ दवा कंपनियों, दवा विक्रेताओं, चिकित्सकों, अस्पतालों और क्लीनिकों को मिलता है। एक सफल जेनेटिक्स वैज्ञानिक बनने के लिए आपकी रूचि बायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और विज्ञान से सम्बंधित क्षेत्रों में अनुसन्धान की होनी चाहिए।

जरुरी स्किल्स

तेज दिमाग, जिज्ञासु प्रवृत्ति, विज्ञान में गहरी रूचि, रचनात्मकता, नए तरीके ढूँढने की ललक, अंग विज्ञान की गहरी समझ तथा विश्लेषण का कौशल जेनेटिक्स में करियर बनाने के लिए आवश्यक गुण हैं। प्रयोगशाला में लगातार थका देने वाले प्रयोगों और कई बार उलझन में डाल देने वाले काम में घंटों तक लगे रहना और फिर भी सार्थक परिणाम न आने की अनिश्चितता के चलते धैर्य इस क्षेत्र में सफलता की कुंजी की तरह काम करता है। इसलिए आपका धैर्यवान होना बहुत जरुरी है।

प्रमुख संस्थान

जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्यप्रदेश

www.jnkvv.org

आनंद कृषि विश्वविद्यालय, आनंद, गुजरात

www.aau.in

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

www.du.ac.in

चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर

www.csauk.ac.in

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार

www.hau.ernet.in

डॉ पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, अकोला

www.pdkv.ac.in

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना

www.web.pau.edu

 



नर्मदा प्रदेश बनेंगे निकट भविष्य में भीषण बाढ़ और सूखा के कुरुक्षेत्र – जल बिरादरी की चेतावनी

‘जल जन जोड़ो अभियान’ के तहत देश भर में काम कर रहे संगठन ‘जल बिरादरी’ ने कहा है कि केरल जैसी बाढ़ की तबाही और बुंदेलखंड जैसे सूखे के कुप्रभाव नर्मदा क्षेत्र में आने वाले क्षेत्र मध्यप्रदेश, गुजरात और उनके के सभी जिले पर पड़ेंगे। ये दोनों आपदाएं दिखने में प्राकृतिक लगेंगी लेकिन ये हैं पूरी तरह मानव निर्मित।

पहला भीषण बाढ़ और दूसरा सूखा। एक तरफ वे क्षेत्र होंगे जो जल की अति उपलब्धता यानी बाढ़ से पीड़ित होंगे और दूसरा वे क्षेत्र होंगे जो जल की अति अनुपलब्धता यानी कमी से ग्रस्त होंगे। संकट का सीधा सम्बन्ध जल से ही रहेगा। जल या तो बहुत ज्यादा होगा या बिलकुल नहीं होगा।

नागपुर, मुंबई, दिल्ली, भोपाल, चेन्नई, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड के बाद अब केरल – बाढ़ से होने वाली तबाही हर साल की आम कहानी है। लगभग 8 माह पश्चात गर्मियों में पानी के लिये हाहाकार की ख़बरें आम हो जाएँगी। छोटे हों या बड़े – सभी शहरों के डेवलपमेंट में हमारे छतों, गलियों, सड़कों में गिरने और बहने वाले पानी की ठीक निकासी के लिये पंचायत से लेकर केंद्र तक कोई सरकार बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम नहीं कर रही।

हम अपने ही छत के पानी को अपने ही बोर में नहीं पहुँचा रहे। यह काम तो हमें स्वयं ही करना होता है। इतना कर लेने मात्र से बाढ़ बहुत कम हो जाये।

नदी, जल, जंगल, जमीन और उसके पर्यावरण के साथ जो खिलवाड़ और लापरवाही हम थोड़ी थोड़ी प्रतिदिन करते हैं, प्रकृति उसका हिसाब चंद मिनटों में कर देती है। हम रोज अपने घर और ऑफिस का कचरा प्रकृति के इन दूतों की झूली में फेंकते जाते हैं।

एक दिन की भीषण बारिश, तूफ़ान, आंधी यह कचरा हमें एक पल में वापस करके तबाही मचा देती है। जितना कचरा केरल में नदी, नालों, तालाबों, भूमिगत स्रोतों, समुद्र आदि में फेंका गया वो सब उसने एक झटके में हमारे गांवों, शहरों, घरों और गलियों में ससम्मान वापस कर दिया। प्रकृति का काम है देना। वह अपने पास कुछ बचाकर नहीं रखती। आप उसे जो भी दोगे, वक़्त आने पर वह उसे वापस कर देगी।

नर्मदा का अंधाधुंध रेत खनन भविष्य में बाढ़ और सूखा की नींव

नर्मदा नदी का पानी पाइपलाइन के द्वारा शहरों में लाने के लिए अरबों रूपये बर्बाद कर रहे हैं। होना इसके विपरीत चाहिए।  बारिश में गिरने और बहने वाला पानी सड़कों, घर और भवन की छतों, शहरों, गांवों से इसी तरह की पाइपलाइन और अन्य जल संरचनाओं के माध्यम से सूखी नदियों, तालाबों और भूजल स्रोतों में पहुचाया जाना चाहिए।

परन्तु जल संकट से निपटने के लिये सरकारें नदियों को जोड़ने पर काम कर रहे हैं।  2-3 महिने की बारिश और देश भर का पानी अगर उन नदियों, भूजल स्रोतों, तालाबों, नहरों आदि में पहुँचाने की परियोजनाएं बनें तो बाढ़ के ऐसे आतंक देखने न मिलें। सभी बाढ़ प्राकृतिक कम कृत्रिम ज्यादा बना ली गयी हैं।



गंगा सहित तमाम अन्य बड़ी नदियों की तरह नर्मदा और उसकी सभी सहायक नदियों में से जिस रफ़्तार से रेत खाली की जा रही है, उसकी वजह से आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश और गुजरात भी ऐसी भीषण बाढ़ से ग्रसित होंगे। पेड़ वर्षा जल के बहाव को कम करते हैं, जल के बहाव के लिए स्पीड ब्रेकर की तरह काम करते हैं। और नदी की रेत जल को अपने अन्दर ढांक कर रखती है। इन दोनों के अभाव में जल का मद मस्त होकर बाढ़ के रूप में गाँव और शहरों में तबाही मचाना स्वाभाविक है।

अति बाढ़ और अति जल संकट – ये हमारे भारत की वर्तमान हकीकत है। इस विरोधाभास के जिम्मेदार हम सब हैं जो सभी राजनैतिक पार्टियों की सभी सरकारों द्वारा किये जाने वाले अंधाधुंध बिना योजना के विकास कार्यों की हाँ में हाँ और न में न मिला देते हैं।

जानना ही कुछ करने की शुरुआत है। कम से कम इतना जान लें कि बाढ़ और जल संकट दोनों हमारे अपने द्वारा बनाये संकट हैं। जब तक हमें लगेगा यह सिर्फ नेताओं का किया धरा है तब तक हम उसके उपायों के बारे में कुछ नहीं करेंगे। राजनैतिक पार्टियाँ, सरकार और नेता अगर कोई भ्रष्टाचार करते हैं तो उसका पहला और मूल कारण हमारा अज्ञान और उदासीनता है। समस्याओं का सही ज्ञान होना उनके हल की तरफ पहला कदम है।

इसी समझ और ज्ञान को को बढाने के लिए तरुण भारत संघ में प्रत्येक माह तीन दिन का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जाता है जिसमें देश और विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, छात्र-छात्रा, प्रशासनिक अधिकारी और जागरूक गणमान्य प्रशिक्षण में भाग लेने आते हैं।

मध्यप्रदेश सहित भारत देश के सभी राज्यों, वहाँ की जनता, किसानों की भूमि आदि को जल संकट, बाढ़ और सूखा से बचाने के लिए ‘जल जन जोड़ो अभियान’ में सक्रिय भागीदारी निभाएं। यह काम अकेले सरकार और सामाजिक संगठनों का नहीं है। संकट यह देखकर दस्तक नहीं देता कि भ्रष्टाचार नेताओं ने किया है इसलिए इसका शिकार आम जनता को न बनाया जाए। दुर्भाग्य से शिकार हमेशा आम जनता ही होती है। नेता, उनका परिवार और राजनैतिक पार्टियाँ कभी इसका शिकार नहीं होतीं।