माँ नर्मदा की दुर्दशा की जिम्मेदार ‘गांधारी’ और उसके ‘लालची-दुराचारी बेटों’ की संक्षिप्त रामायण

यह कहानी बहुत ज्यादा पुरानी नहीं है। लगभग 15 से 20 साल पहले नर्मदा मैया के बेटे जो आज ‘बड़े’ हो गए हैं, वे उस समय ‘छोटे’ थे। राजनीति और तथाकथित धर्म के गर्भ में उन्होंने नया-नया जन्म लिया था। जैसा कि हमेशा होता है, इन बच्चों को उस समय माँ के लालन पोषण की जरुरत थी। जब तक बच्चे छोटे होते हैं तब तक उन्हें माँ की हमेशा जरुरत होती है। बच्चे भी अपनी माँ से बहुत प्यार करते हैं और उसके बगैर रह नहीं पाते।

माँ का लाड प्यार, दुलार पाकर बच्चे धीरे धीरे बड़े होने लगे। जब बच्चे छोटे होते हैं तो २४ घंटे माँ के इर्द गिर्द रहते हैं। एक पल के लिए भी माँ से दूर नहीं रह पाते। ठीक ऐसे ही हमारे क्षेत्र के नेतागण, तथाकथित साधु, संत और महात्माओं ने माँ नर्मदा की खूब परिक्रमा की। माँ नर्मदा के इर्द गिर्द घूमे।

आम तौर पर ऐसा होता है – जब बच्चे ‘बड़े’ और ‘समझदार’ हो जाते हैं, जब उनका ‘विवाह’ हो जाता है, उनके ‘अपने घर’ बस जाते हैं, उनके घर ‘लक्ष्मी’ आ जाती है, स्वयं उनकी अपनी औलादें हो जाती हैं, उनके अपने परिवार के सदस्यों और औलादों की जरूरत और फरमाइश बढ़ने लगती हैं, तब इन बड़े हो गए बच्चों का अपनी ‘माँ’ से लगाव कम हो जाता है। बीमार और बूढी माँ से लगाव अगर थोडा बहुत बचता भी है तो इसलिए क्योंकि माँ की जायजाद अभी उनके नाम नहीं हुई होती।

नर्मदा माँ के वारिस

अगर इकलौती औलाद हो तो झगड़े और बंटवारे की कोई बात न हो। लेकिन नर्मदा मैया की एक से ज्यादा संतान हैं जिनके अलग अलग नाम हैं। जैसे – भाजपा और कांग्रेस। इनके भी अब अपने अपने कुटुंब हैं, परिवार हैं, सदस्य हैं।

उस समय के छोटे बच्चे जो अब बड़े हो गए हैं, उनका अपना परिवार बन गया है, इस परिवार में उनके अपने रिश्तेदार और ठेकेदार हैं, इनकी सत्ता से शादी हो चुकी है, इनके सर पर विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री रुपी दूल्हे के मुकुट हैं, दहेज (ठेकेदारी के माध्यम से) में बहुत सारा धन भी मिला है, इस तरह घर में अब ‘लक्ष्मी’ आ रही है। परिवार और कुटुंब अब बढ़ गया है। बच्चों की अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं, उनका भी भविष्य बनाना है, इसके लिए अब और पैसे की जरुरत है। जब अपनी माँ के पास बहुत सारी जायजाद हो तो क्या हर्ज़ है उस ‘प्रॉपर्टी’ को अपने नाम कर लेने में।

माँ ने भी अपनी जायजाद आधी-आधी बाँट दी है। 5 साल भाजपा के लिए और 5 साल कांग्रेस के लिए। मध्यप्रदेश में नर्मदा माँ दोनों का बहुत ख्याल रखती आयी हैं। 10 साल कांग्रेस को दिए थे, 15 साल भाजपा को दिए।

माँ नर्मदा अब बूढी हो चली हैं, इन दोनों प्रिय बेटों ने अपनी नर्मदा माँ का आँचल निचोड़ डाला है, अब वह ICU में भर्ती है। कब वह अपनी अंतिम सांसे ले ले, कोई कह नहीं सकता। उसके शरीर में जीवनदायी रक्त को प्रवाहित करने वाली विभिन्न धमनियाँ जिन्हें हम सहायक नदियों के नाम से जानते हैं, लगभग समाप्त हो चुकी हैं। बिना धमनियों के माँ अगर जिंदा बच भी जाये तो वह अपाहिज सी अपनी ज़िन्दगी बसर करेगी।



नर्मदा माँ के प्रिय बेटे अब चाहते हैं कि माँ का जल्द से जल्द ‘स्वर्गवास’ (सूख) हो जाये ताकि उसकी सारी ‘जायजाद’ (रेत) वे अपने नाम कर सकें। इस हेतु नर्मदा का जल पाइपलाइन के माध्यम से शहरों में भेजे जाने का इंतज़ाम युद्ध स्तर पर हो रहा है। जहाँ इस पानी को भेजे जाने के लिए पाइपलाइन बिछायी जा रही हैं, वहां जल का कोई भयानक संकट नहीं है। जो थोड़ी बहुत परेशानी जल की है उसे वर्षा जल संरक्षण के माध्यम से आसानी से दूर किया जा सकता है।

गाँव की पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम, विधानसभा, लोकसभा, प्रदेश और देश – लगभग सभी जगह एक ही बेटे की सरकार है। कोई सामने झगडा करने या काम करने से रोकने वाला भी नहीं है। सभी तरह की तकनीक, संसाधन, धन भी इनको उपलब्ध है। अगर ये चाहें तो बारिस के मौसम में व्यर्थ बह जाने वाले पानी को भूमिगत स्रोतों में पहुँचाने का तंत्र सिर्फ एक साल में खड़ा कर सकते हैं।

पानी के व्यापार की ठोस नींव

लेकिन ये ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि भविष्य में पानी के टैंकर का बिज़नस कैसे फलेगा फूलेगा? आज ये रेत चोरी करके हमें रेत बेच रहे हैं, कल यही लोग छोटे-बड़े बांधों से पानी के टैंकर भरकर हमें पानी भी बेचेंगे। बहुत जगहों पर बिक भी रहे हैं। शहरों में पानी के टैंकर बिक ही रहे हैं। अब छोटे छोटे कस्बों में भी यह व्यापार शुरू हो गया है। गांवों में भी शुरू हो जायेगा।

अभी जो पाइपलाइन बिछायी जा रही है, उसके ठेकों में एक तरफ इनकी कमाई हो रही है, दूसरी तरफ नर्मदा का जल शहरों में पहुंचाकर नर्मदा के तटों को जल से शून्य करना है, ताकि रेत बेरोकटोक और आसानी से डम्फरों में भरकर अपने ठिकानों पर जमा की जा सके।

घर बैठे नर्मदा स्नान का पुण्य

हम और आप खुशनुमा भ्रम में जी रहे हैं और सोच रहे हैं कि हमारे जन प्रतिनिधि कितने अच्छे हैं जो नर्मदा का जल हमारे घरों तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं। नर्मदा का जल जब घर में ही उपलब्ध हो जायेगा तो कौन भला अमास (अमावश्या), पूनो (पूर्णिमा) और कार्तिक आदि के महीनों में स्नान करने नर्मदा तटों पर जायेगा। नर्मदा जल में स्नान करने का पुण्य तो घर बैठे ही मिल जायेगा।

प्रशासनिक अधिकारी, नेता और ठेकेदारों की भी झंझटें समाप्त हो जाएँगी। उन्हें जबरन अमावश्या, पूर्णिमा और स्नान के महत्व वाले महीनों में बाँध का पानी छोड़ना नहीं पड़ेगा। लोगों द्वारा घाटों पर इन दिनों में स्नान करने की वजह से रेत के खनन में व्यवधान उत्पन्न होता है। इन दिनों बांधों से पानी इसलिए छोड़ा जाता है ताकि जल के भराव को देखकर हमें लगे कि नर्मदा कभी नहीं सूखेगी।

एक तरफ हम माँ नर्मदा की महाआरती कर पुण्य कमा रहे होते हैं, दूसरी तरफ ठीक उसके उस पार वाले घाट पर बेधड़क जेसीबी, पोकलेन से एक के बाद एक डम्फरों को भरकर माँ नर्मदा की हत्या सरेआम दिखाई दे जाती है। रेत माफियाओं के संरक्षक छोटे-बड़े अधिकारी-नेता भी हमारे साथ महाआरती में सम्मिलित होकर पुण्य लाभ कमा लेते हैं।

कौन हैं ध्रतराष्ट्र और गांधारी

हमारा इन नेताओं से ठीक वैसा ही सम्बन्ध हो गया है जैसे गांधारी का ध्रतराष्ट्र के साथ था। भारत देश लगता है अन्धो का राष्ट्र है। जनता गांधारी है। ध्रतराष्ट्र की दुराचारी और लालची संतान धन, सत्ता और अपनी हवस के लिए कितने भी बुरे से बुरे कार्य करते रहें, ध्रतराष्ट्र को कोई फरक नहीं पड़ता। आँखों के साथ साथ वह अपनी सोच और समझ से भी अंधा है।  दुराचारी और लालची संतान को वह हर कीमत पर सत्ता की कुर्सी पर बने रहने के लिए अपना समर्थन प्रदान किये जाता है।

हम आम जनता गांधारी की तरह अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं और अपने पति-परमेश्वर ध्रतराष्ट्र का मौन रहकर समर्थन किये जाते हैं। हम देख सब कुछ सकते हैं, लेकिन जान बूझकर अपने स्वार्थ की वजह से आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं और सब अनदेखा किये जाते हैं। हमारे बीच के बड़े हो गए साधु संत भी सत्ता की चमक दमक से प्रभावित हो ही जाते हैं और राज्यमंत्री जैसे पद और जीवन भर की पेंशन पाने में सफल हो जाते हैं।



समाज, धर्म और राजनीति के बड़े बड़े योद्धा ठीक वैसे ही चुप बैठे रहते हैं जैसे द्रौपदी के चीर हरण के समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, कर्ण आदि चुप बैठे थे। इनके अपने स्वार्थ हैं, इनकी अपनी प्रतिबद्धतायें हैं ध्रतराष्ट्र, दुर्योधन का साथ देते रहने की। ये सत्ता और स्वार्थ के प्रति इतने ज्यादा कर्तव्य से बंधे होते हैं कि जानते हुए भी अधर्म का साथ देते हैं और भगवान के विरोध में भी युद्ध करने खड़े हो जाते हैं।

हमें कैसी ज़िन्दगी भविष्य में मिलने वाली है

गांधारी को जो हश्र हुआ था महाभारत में, वही हश्र हमारा होगा। हमें वह जीवन जीना पड़ेगा जो गांधारी को जीना पड़ा था – वनवास का जीवन। बहुत लोग ऐसा जीवन जी भी रहे हैं। कहने का अर्थ है कि अगर भविष्य में हमें हमारे घर से बेघर करके भटकने सडकों या जंगलों में छोड़ दिया जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। यही हमारे गांधारी बने रहने की सही सज़ा भी होगी।

हमारी आदतें ऐसी हैं जैसे हमारे शरीर में छोटी मोटी कोई तकलीफ या बीमारी घर कर जाती है तब हम उसे वर्षों तक टालते हैं। हम सोचते हैं कि यह अपने आप ठीक हो जाएगी। हम सिर्फ अपने घर की साफ़ सफाई से मतलब रखते हैं। घर का कचरा साफ़ किया और पड़ोस में खाली जगह देखकर उसे चुपके से सार्वजनिक जगह में फेंक दिया। पढ़े लिखे होने पर भी हम इस तथ्य को नज़रअंदाज करते रहते हैं कि कचरा अगर आस पड़ोस में है तो उसके कीटाणु वापस हमारे घर और शरीर में प्रवेश करेंगे, हमें बीमार बनायेंगे।

हम एक अनिश्चित निश्चिंतता में जीते रहते हैं कि हम कभी बीमार नहीं पड़ेंगे, यह छोटी बीमारी कभी बड़ी नहीं होगी, यह अपने आप ठीक हो जाएगी, यह कभी महामारी का रूप नहीं लेगी। प्लेग जैसी महामारी शायद कभी न भी आये लेकिन जल, वायु, भोजन, सब्जी, फल आदि का प्रदूषण, बेरोजगारी, जनसँख्या, धर्म-जाति-राजनीति आधारित दंगे, महिला अत्याचार, बेटियों के बलात्कार और हत्या, बाढ़, सूखा क्या किसी महामारी से कम है?

गन्दगी में रहने के आदी

शायद अब हम इस तरह की महामारी के आदि हो चले हैं। ठीक वैसे जैसे चीनी मीलों के आसपास रह रहे लोगों को चीनी मीलों से आने वाली बदबू में रहने की आदत हो जाती है। उन्हें उस बदबू से ज्यादा कुछ फरक नहीं पड़ता। 24 घंटे वे उस बदबू के बीच अपनी जीवन मजे से बसर किये चले जाते हैं। हम भी समाज, राजनीति, धर्म में पनप रही हर तरह की सड़ांध और गन्दगी के बीच रहने के इतने आदि हो चुके हैं कि अब अगर यह गन्दगी न हो तो शायद हम जीवित न रह सकें। शराब की तरह इन सबकी हमें लत लग चुकी है।

गाँव, तहसील, जिला, नगर, प्रदेश और देश के स्तर पर हमारे ही बीच के अपराधी, नेता, सांसद, विधायक, मंत्री आदि इतनी बड़ी महामारी का रूप ले चुके हैं कि चाहते हुए भी हम उनका वैसा ही कुछ नहीं कर पाते जैसा आज हम विषैले कीटनाशक भरे भोजन, दूध, पानी, प्रदूषित हवा का कुछ नहीं कर पाते।

नर्मदा का अवैध खनन हो या कटते पेड़ और जंगल, जल का संकट हो या महिलाओं और बेटियों का बलात्कार, बेरोजगारी हो या वायु प्रदूषण – सबके ज़िम्मेदार हम और हमारा गांधारी रूप है। भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की तरह एक दूसरे को कोसना और गलत ठहराना बहुत आसान है। हम स्वयं ऐसे हैं, इसलिए हमारे नेता ऐसे हैं। गलती हम करें तो दूसरा जिम्मेदार, गलती दूसरा करे तो तो वो है ही जिम्मेदार।



बैंगन, टमाटर, आलू, प्याज भी खरीदना हो तो हर बार हम एक एक सब्जी स्वयं देखकर, टटोलकर और तौलकर लेते हैं, आँख बंद करके बेचने वाले के ऊपर नहीं छोड़ देते, चाहे हमारी उससे कितनी भी अच्छी जान पहचान क्यों न हो। लेकिन जब हमारा प्रतिनिधि चुनने की बारी आती है तब बार बार ठगे जाने के बावजूद, सड़े गले वादे थमा दिए जाने के बाद भी हम आँख बंद कर इनकी गांधारी बन जाते हैं।

हम अपने माता-पिता, जीवनसाथी और बच्चों के प्रति इतनी वफ़ादारी नहीं निभाते जितनी हम हमारी भाजपा, कांग्रेस और इनके नेताओं के प्रति निभाते नज़र आते हैं। हमारे अपने माता-पिता, पति-पत्नी, रिश्तेदार, बच्चे आदि हमारी अपनी जाति, समाज के होते हैं, हमारा अपना खून होते हैं, लेकिन इनके प्रति हमारा इतना समर्पण नहीं होता जितना हमारे नेताओं से अपनी जाति-समाज, क्षेत्र आदि की समानता मिल जाने पर हो जाता है। हमारी जाति, गाँव का है इसलिए हम उनसे अपनी रिश्तेदारी निकाल लेते हैं। लक्ष्य – दूसरों के सामने इन नेताओं से अपनी घनिष्ठता का दिखावा करना और अपने काम बनवाना।

क्या कोई उपाय है ?

नर्मदा का अवैध खनन और दूसरी समस्याएं तब तक बनी और बढती रहेंगी जब तक हम गांधारी बने रहना पसंद करते रहेंगे। निष्पक्ष कृष्ण बन जाओगे तो दोनों पक्ष के लोगों को सजा दिलाकर उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचा सकोगे। पाप कौरवों ने भी किया था और पांडवों ने भी। वंश दोनों का समाप्त हुआ। कोई कहे कि कृष्ण ने पांडवों को बचा लिया तो वह भ्रम में है। पांडवों के भी वंश का नाश हो गया था। अंत में पांडव भी वनवास को गए और एक एक करके समाप्त हो गए।

आज धरती माँ, प्रकृति और माँ कहलाने वाली स्त्री – सभी का बलात्कार और चीर हरण (शोषण, हनन, खनन) हो रहा है। यह तय है कि हमारा व्यवहार या तो कौरवों जैसा है या फिर पांडवों जैसा। एक दांव पर लगा रहा है तो दूसरा उसका चीर हरण कर रहा है। युद्ध द्रौपदी की अस्मिता के लिए नहीं हुआ था। महाभारत का युद्ध सत्ता में हिस्से के लिए हुआ था। द्रौपदी के लिए युद्ध होना होता तो वहीँ हो गया होता जहाँ उसका चीर हरण करने के लिए घसीटा गया था। भीम को उसी जगह दुर्योधन की जंघा तोड़ देनी चाहिए थी।

“कौरव और पांडव आपस में एक दूसरे के दुश्मन भले ही हों लेकिन दोनों की रगों में खून एक ही दौड़ता है। सत्ता के लिए वे अपनी स्त्री (धरती, प्रकृति, जनता) को दांव पर भी लगा सकते हैं और एक दूसरे का गला भी काट सकते हैं। द्रौपदी की इज्ज़त दोनों ने उछाली, चीर हरण सबने किया।  जिन्होंने सिर्फ देखा उन्होंने भी।” 

हमें न इधर से लड़ना है और न उधर से। हाँ, अंजाम तक दोनों को पहुँचाना है – अगर इच्क्षा हो तो। वर्ना जैसा चलते आ रहा है, चलने दो। बने रहो गांधारी।

जय माँ नर्मदा