कर्मठ राजनैतिक कार्यकर्ता के ‘मन की बात’

मैं एक आम परिवार में आम माता पिता की संतान के रूप में पैदा हुआ। मेरी माता परंपरागत रूप से एक गृहणी हैं। पिताजी कोई छोटी मोटी नौकरी या काम धंधा और गाँव में खेती आदि करके मेरे साथ मेरे भाई बहनों और परिवार का भरण पोषण मुश्किल से करते हैं। मेरे माता पिता की हैसियत इतनी नहीं कि वे मुझे किसी मंहगे अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिला सकें जहाँ अच्छी शिक्षा पाकर भविष्य में अपने लिए अच्छा करियर बनाने के साथ-साथ माँ बाप का सहारा बन सकूँ।

मजबूरन मेरा और मेरे भाई बहिनों का दाखिला सरकारी स्कूल में करना पड़ता है। सरकारी स्कूल में कभी अच्छी पढाई लिखाई नहीं होती। जो थोड़ी बहुत होती है वह दिखावे मात्र की होती है। अगर अच्छी पढाई होती तो हमारे विद्यालय के शिक्षक और शिक्षिका स्वयं के बच्चों का एडमिशन किसी प्राइवेट स्कूल न कराते। शिक्षकों, अधिकारियों और नेताओं के बच्चे भी हमारे साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे होते।

हमारे सरकारी स्कूल में सिर्फ और सिर्फ गरीब परिवार के बच्चे पढ़ते हैं। हमारे परिवार के लोग ज्यादातर छोटे मोटे काम में मेहनत-मजदूरी और खेती-किसानी करते हैं। कहीं कोई रिक्शा चलाता है, तो कोई चौकीदार होता है, कहीं मंडियों और गोदामों में अनाज और अन्य सामानों के बोरे धोने का काम करते हैं तो कहीं कोई किसी व्यापारी की दुकान में काम करता है। घर की महिलाएं भी ईंट, गिट्टी, रेत, गारे आदि का काम करती हैं, या किसी के घर बर्तन मांजने और झाड़ू पोंछा का काम, कुछ काम नहीं मिलता तो खेतों में जाकर मेहनत मजदूरी करती हैं।

कुछ चुनिन्दा बहुत मंहगे प्राइवेट स्कूल को छोड़ दें तो ज्यादातर प्राइवेट स्कूलों में भी पढाई बहुत अच्छी नहीं होती। वह सिर्फ सरकारी स्कूल से थोड़ी बेहतर होती हैं। ऐसे स्कूलों में पढने वाले बच्चों के माँ बाप एक भ्रम में रहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन स्कूल में शिक्षक और शिक्षिकाओं को चूंकि नाम मात्र की तनख्वा मिलती हैं इसलिए अच्छी और पूरी शिक्षा वे अपने घर या कोचिंग संस्थान में प्राइवेट कोचिंग या ट्यूशन करके देते हैं। उनकी भी अपनी मजबूरी है। बेरोजगारी और मंहगाई के इस दौर में जहाँ 3000-5000 तनख्वा मिले वहाँ परिवार तो क्या अगर स्वयं का ही महीने का खर्च निकल आये तो बड़ी बात है। इसलिए प्राइवेट कोचिंग और ट्यूशन का सहारा लेना पड़ता है।



कहीं किसी ज़माने में जब प्राइवेट स्कूल नहीं हुआ करते थे तब सरकारी स्कूल में कुछ अच्छी पढाई हुआ करती थी। जब से अमीर लोगों के या अमीर बनने के उद्देश्य से प्राइवेट स्कूल अस्तित्व में आये हैं तब से सरकारी स्कूल शिक्षा के नाम पर सिर्फ एक दिखावा बस रह गया है। बड़े बड़े अधिकारियों, उद्योगपतियों नेताओं, अमीरों, उद्योगपतियों आदि के स्वयं के अपने अपने प्राइवेट स्कूल हैं। शिक्षा के क्षेत्र में फैला माफिया अन्य सभी माफियाओं से बड़ा और ताकतवर है क्योंकि इसमें देश और प्रदेश के बड़े बड़े नेता (सभी राजनैतिक पार्टियों के), उद्योगपति, मंत्री, विधायक, सांसद, करोडपति, अरबपति, अमीर लोग घुसे हुए हैं।

सोच समझकर सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर गिराया

गरीब बच्चों को मुफ्त साइकिल, यूनिफार्म, पुस्तकें, कभी लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन, मध्यान्ह भोजन जैसी चीजें देकर ऐसा लगता है जैसे नेताओं, सरकार और पार्टियों को हमारे भविष्य की बहुत चिंता है। पढाई के नाम पर हम आठवीं कक्षा तक थोडा बहुत पढना और लिखना सीख लेते हैं, उतना जितना रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जरुरी है। साक्षर जैसे हो जाते हैं। 8वीं कक्षा तक अगर अब परीक्षा पास न भी करें तब भी हमें अगली कक्षा में भेज ही दिया जाता है। अब शिक्षकों के ऊपर भी अच्छी शिक्षा का दबाव नहीं। दबाव उनपर शत प्रतिशत परीक्षा परिणामों का होता है। वे जैसे तैसे हमें परीक्षा में पास करा ही देते हैं। कभी प्रश्नों के उत्तर बताकर तो कभी बोर्ड पर जवाब लिखकर।

सरकार हमारे परिवार को एक रूपये किलो के हिसाब से अनाज और नमक आदि उपलब्ध कराकर हमारे ऊपर बहुत अहसान करती हैं। हम सभी चूंकि पढ़े लिखे लोग नहीं होते इसलिए हमें लगता है सरकार हमारा बहुत कल्याण करती है। इसके बदले आँख बंद करके उन्हें चुनाव में वोट डाल आते हैं। चुनाव के वक़्त जब बड़े बड़े नेता हमारे घर आकर हमारे हाथ पैर छूकर हमसे आशीर्वाद के तौर पर वोट मांगते हैं तो हमें लगता है जैसे उनसे जैसे विनम्र और कोमल ह्रदय वाले इंसान दुनिया में कोई नहीं होते।

हम कभी नहीं समझ पाते कि अच्छी शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और अन्य सामाजिक कल्याणकारी सेवाएं देना सरकार और नेताओं के काम और जिम्मेदारी है। जो भी पैसा सरकार हम सभी के ऊपर खर्च करती है वह असल में हम आम जनता का ही पैसा होता है जो हम सभी उन सभी चीजों के माध्यम से टैक्स के रूप में सरकार के खजाने में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने खून पसीने की कमाई से जमा करते हैं जो हम अपनी रोजमर्रा के ज़िन्दगी में इस्तेमाल करते हैं।

हर वह वस्तु चाहे वह बच्चों द्वारा खायी जाने वाले 50 पैसे वाली कीमत की चॉकलेट ही क्यों न हो उसमें से भी टैक्स के रूप में हमारा पैसा सरकार के पास जमा होता है। यही पैसा वह हमारे ऊपर विभिन्न योजनाओं के द्वारा खर्च करती है। खर्च कम होता है, उद्देश्य उसमें से पैसा बनाना उनका और उनके ठेकेदारों और अधिकारियों का लक्ष्य होता है।



जान बूझकर सरकारी संस्थानों का शैक्षणिक स्तर घटिया रखा जाता है ताकी पढ़ लिखकर हममें यह समझ पैदा न हो सके कि सरकार, राजनैतिक पार्टियों और उद्योग घरानों की जेबें हम आम इंसानों के पैसे और मेहनत से ही भरती हैं। लाखों रूपये की बिना टैक्स वाली विधायकों और सांसदों की मासिक सैलरी हमारे पैसे से ही दी जाती है। शासन और प्रशासन के सभी स्तरों के अधिकारीयों की तनख्वा और तमाम सुविधाएँ आम आदमी के टैक्स द्वारा भरे जा रहे पैसे से ही जाती है। सरकार, शासन और प्रशासन अलग से नहीं आयी हुई होतीं।

वे सभी हमसे हैं, हम उनसे नहीं। लेकिन यह समझ तो पढ़ लिखकर ही आ सकती है। सिर्फ बड़े बड़े महापुरुषों की मूर्तियों, उनकी जयंती आदि मना लेने से यह ज्ञान तो आने से रहा। कभी हमें स्कूल और कॉलेज में ठीक से इतिहास और सभी विषय पढाये गए हों तब तो हमें पता चलेगा कि इतिहास की कौन सी बातें सत्य हैं और कौन सी असत्य। हमें तो हमारे नेताजी जो पढ़ा देते हैं हमारे लिए वही सत्य हो जाता है।

चूंकि अच्छे से पढाई करके हमने परीक्षा पास करना सीखा नहीं होता इसलिए कभी हमारी गाड़ी 10वीं क्लास में ही अटक जाती है तो कभी 12वीं में। रट्टा मार मार के जैसे तैसे 10वीं और 12वीं पास कर भी लेते हैं तो उसके बाद कॉलेज में कोई ऐसा सब्जेक्ट ले लेते हैं जिसे परीक्षा के सिर्फ एक महीने पहले बुक स्टाल पर मिलने वाली 20 Question सीरीज पढ़कर एग्जाम दे आओ और पास हो जाओ। पास होना ही एक मात्र लक्ष्य होता है। बस हाथ में एक डिग्री आ जाये ताकि गिनती पढ़े लिखे लोगों में होने लगे। बस कोई अनपढ़ या गंवार न कह सके।

राजनीति के लिए दिमाग न लगाने वाले जोशीले नवयुवक

इस दौरान अपने दोस्तों के साथ गली कूचे, पान ठेले, चाय दुकान और किसी अड्डे पर नियमित रूप से आने जाने के दौरान हमारी मुलाकात किसी न किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं से हो जाती है। कुछ बड़े नेता और कार्यकर्ता जब हमारे घर आकर हमसे और हमारे परिवार के लोगों से आकर हमसे मिलते हैं तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। हमें लगता है हम बहुत ख़ास हैं। और ऐसा लगना स्वाभाविक है।

ऊपर के बड़े नेता जमीनी नेताओं को यही सिखाते और पढाते हैं कि कैसे भोले भाले नवयुवकों और आम जन को प्रभावित करना है। आस पड़ोस के लोगों के सामने जब बड़े नेता जी हमारे कंधे पर हाथ रखकर मित्रों जैसे व्यवहार करते हैं तो हमारे अन्दर बड़ी ताकत और जोश का संचार हो जाता है। आखिर जीवन में सबसे ज्यादा आकांक्षा किसी के मन में होती है तो वह है दूसरों को प्रभावित करने की इच्क्षा। लोगों के बीच हमारी पहचान बने, लोग हमारे व्यक्तित्व का आभास करें, हमें पहचानें, हमें महत्त्व दें, हमें शक्तिशाली मानें, हमसे थोडा डरकर रहें।



आखिर यही सब इच्क्षाएं तो हमारे मन में जाग्रत होती हैं। पूरी दुनिया इन्ही सबके पीछे तो दौड़ रही है। हमारे पास इन सब कामनाओं को पाने का और दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं होता। इसलिए हम राष्ट्रभक्ति, देशसेवा, धर्म रक्षा, समाज सेवा, समर्पण आदि शब्दों और प्रभावशाली भाषणों के प्रभाव में आकर इसी राजनीति को अपना जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं।

गाँव, मोहल्ले और शहर में नेताओं के जलवे देखकर हम भी उनकी तरफ खिचे चले जाते हैं। रैलियों और प्रदर्शन के लिए मुफ्त में हमारी गाडी में पेट्रोल डल ही जाता है।

भीड़ में झंडे लेकर जोर जोर से नारे लगाने और प्रदर्शन करने में हमें महसूस होता है जैसे हम बहुत ताकतवर हो रहे हैं। जवानी के जोश में हमें लगने लगता है कि अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने और प्रभावशाली बनने का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता। पढ़ लिखकर ज्यादा से ज्यादा हम कोई नौकरी करने के लायक बनते।

लेकिन बिना पढ़े लिखे इस तरह नेताजी और पार्टी के लिये काम करने के दौरान पूरी सम्भावना हमें दिखती है की भविष्य में हमें भी कोई न कोई टिकट शायद मिल ही जाएगी और हम पढ़े लिखे अधिकारियों के बॉस बनकर बैठेंगे। अगर टिकट न भी मिली तब भी नेताजी के माध्यम से कोई न कोई सरकारी ठेका हमें मिल ही जायेगा जिसके जरिये अच्छा खासा पैसा हम बना सकेंगे। कुछ हासिल न भी हो तब भी हमें लगता है कि कुछ नहीं तो कम से कम हमारी बड़े बड़े लोगों से पहचान तो है। वक़्त आने पर हमारे साथ एक फ़ौज तो खड़ी है। पर कौन सा वक़्त हम कभी नहीं जान पाते। ऐसा हम दूसरों से सुनते हैं और हम भी यही दोहराने लग जाते हैं।

जेल जाने और पुलिस द्वारा हमें पकड़ लिए जाने पर हमारा रुतबा कम होने की जगह बढ़ता ही है। लोग हमसे डरने लगते हैं, हमें दुआ सलाम ठोकने लगते हैं। ज़िन्दगी में और चाहिए भी क्या होता है? पढ़ लिखकर भी लोग नाम और पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते हैं। बिना पढ़े लिखे तो यह काम और भी आसान नज़र आता है। पढ़े लिखे लोग भी नमस्ते ठोकते हैं।

जितना पैसा लोग नौकरी करके मेहनत आदि से नहीं कम सकते उससे कहीं ज्यादा हम सिर्फ थोड़ी बहुत गुंडागर्दी, दबाव्, ठेकेदारी, बलैकमेलिंग आदि के माध्यम से कमा सकते हैं। कितने ही पत्रकार, नेता, ठेकेदार, उद्योगपति आदि कितने ही गैरकानूनी तरीके से पैसे कमाते हैं, चूंकि हमें उनकी जालसाजी का पता होता है इसलिए हम सोचते हैं उसमें से थोडा बहुत हिस्सा हमारा भी बन ही जायेगा है।



लेकिन हमारी ये सब उम्मीदें पूरी हो जायें ऐसा हर किसी के साथ नहीं हो पाता। ज्यादातर के साथ नहीं हो पाता। कुछ गिनती के साथी जो ज्यादा कुटिल और छल कपट, झूठ यानी राजनैतिक बुद्धि के होते हैं वे ही अपने इन लक्ष्यों को हासिल कर पाते हैं। हमारी ज्यादातर जमात अपनी जवानी के दिन इन्हीं उठापटक में गँवा देती है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। जवानी के 10-15 साल कितने महत्वपूर्ण होते हैं इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हम उम्र के इस पड़ाव को पार करके 35-40 के पार पहुँचते हैं। उस समय हम पाते हैं कि हमने अगर छोटी मोटी दुकान ही खोलकर मेहनत कर ली होती तो शायद ज्यादा सुकून भरा जीवन जी रहे होते।

इस समय तक एक नयी पीढ़ी हमारी जगह ले चुकी होती है। जिसका पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर हम जैसा ही होता है। अब हमारे न हाथ पैरों में इतनी ताकत होती है और न हम मानसिक रूप से इतने कच्चे होते हैं कि आँख बंद करके थोड़ी सी दिखावटी शानो शौकत के चक्कर में अपनी एक मात्र जवानी और जीवन को नेता जी और उनके खास लोगों के लिए कुर्बान करते रहें। जवानी तो गंवा चुके होते हैं। जो थोड़े बहुत ज़िन्दगी के साल बचते हैं उन्हें जैसे तैसे कोई काम धंधा करके सँभालने का प्रयास करने में बिताने मजबूर हो जाते हैं।

सरकारी अस्पतालों में घटिया चिकित्सा सेवा रखे जाने का उद्देश्य

हमारी भी शादी हो जाती है, बच्चे हो जाते हैं। चूंकि हमने अपना आर्थिक और पारिवारिक स्तर सुधारने के लिए कोई प्रयास अपनी जवानी में मेहनत करके नहीं सुधारा होता है इसलिए मजबूरन हमें भी अपने बच्चों का एडमिशन उन्हीं सरकारी स्कूलों में करना पड़ता है। बीच में माता पिता या परिवार में कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाये जैसा की अक्सर होता है तो जो थोड़ी बहुत पूँजी हमने और हमारे परिवार ने बनाई हुई होती है वह प्राइवेट अस्पताल में जाकर ख़तम हो जाती है। अब बच्चों की शादी करने के लिए हमें पूरी तरह सरकार द्वारा करायी जाने वालीं सार्वजानिक विवाह योजनाओं पर निर्भर हो जाना पड़ता है।

हमारे मन कभी भी इन बातों को समझ नहीं पाते। वर्षों तक पार्टी और नेताओं की अंध-भक्ति का हमारी अंतरात्मा पर ऐसा रंग चढ़ा होता है कि हमें उनमें अपना भगवान नज़र आने लगता है। काश हम अपने भाइयों को समझा पाते कि इन नेताओं का एक ही धर्म और ईमान होता है – वह यह कि इनका कोई ईमान धर्म नहीं होता। सत्ता, पैसा और ताकत के लिए जो करना पड़े वही इनका सबसे बड़ा धर्म और ईमान है।



नीचे हम लोगों में जोश भरके ये एक दूसरे का सर फोड़ देने वाली बातें हमारे मन में भर देते हैं और ऊपर ये वक़्त आने पर इधर से उधर और उधर से उधर हो लेते हैं। हम इनके द्वारा बताये गए मुद्दों और सिद्धांतों के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं और ये ऊपर बैठकर उन सिद्धांतों और मुद्दों को अपने स्वार्थ वश बदलते रहते हैं।

गाय की रक्षा जरुरी है तो हमारी अपनी बहनों, बेटियों, माताओं, बहुओं की क्यों नहीं?

भारत माता की जय के नारे हम बचपन से लगा रहे हैं लेकिन हमें सिर्फ गौ माता की चिंता करना सिखाया जाता है। क्योंकि गौ हमें जीवन अमृत दूध प्रदान करती है। गाय को हमारे धर्म ग्रंथों में पूजनीय कहा गया है मैंने हमेशा पूछना चाहा कि हमारी अपनी स्वयं की माँ भी हमें सबसे पहला जीवन अमृत देती हैं। उनके पहले दूध के बिना हम कभी जिन्दा भी न रहे होते और जान भी न पाते कि गौ भी हमारी माता है। हमारे शास्त्रों में तो हर चीज़ पूजनीय है – स्त्री, प्रकृति, पेड़, जीव जंतु, सभी तरह के जानवर, पक्षी आदि भी।

फिर क्यों हमारे नेता, धर्म गुरु, शंकराचार्य, मंदिरों और मठों के कर्ता-धर्ता कभी देश की महिलाओं यानी हमारी अपनी माँ, बहनों, बेटियों, बहुओं आदि के बारे चिंता न करते हैं और न जताते हैं? क्या इसकी एक वजह यह है कि इनके स्वयं के अपने परिवार, बीवी और बच्चियां नहीं होतीं? आजकल शीर्ष पर बैठे बहुत से नेता, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि या तो शादी शुदा नहीं हैं या उनकी बीवी और बेटियां नहीं हैं। देश के प्रधानमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ऐसे दो बड़े उदहारण हैं। हिन्दू संगठनों के ज्यादातर नेताओं के अपने स्वयं के परिवार, बेटियां, बहुएं नहीं हैं।

दूसरे बड़े नेताओं के अपने अपने परिवार और बच्चे अगर हैं भी तो उनके जीवन में कभी कोई संघर्ष आने वाला नहीं है। उनके बच्चे बड़े बड़े ठेकेदार, व्यापारी आदि बन ही जाते हैं। रमन सिंह, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह, सिंधिया, राजेश पायलट, शरद पावर, सोनिया गाँधी, राजेश पायलेट, अजीत जोगी आदि जैसे बड़े नेता हो तो उनकी औलाद आसानी से सांसद या विधायक आदि की टिकट पा ही लेती है। एक बार सांसद और विधायक बनने के पश्चात् उनके पास जीवन भर 50,000 रूपये की पेंशन जीवन भर आनी ही है। उसे कोई नहीं छीन सकता।

फिर 5 साल का कार्यकाल बहुत लम्बा होता है करोड़ों की धन संपत्ति कमा लेने के लिए। माध्यम और छोटे स्तर के नेता भी अपने बेटों, बीवियों, बेटियों, बहुओं, भाइयों, और भतीजों आदि को कोई न कोई टिकट दिलाकर उनका भी उद्धार कर ही देते हैं। टिकट न दिला पायें तब भी काम धंधा, ठेकेदारी और व्यापार आदि में हजारों गुना तरक्की हासिल कर ही लेते हैं।

मंदिरों और मठों के आचार्यों और शंकराचार्यों को भी महिलाओं, बेटियों के साथ होने वाले बलात्कार, हिंसा, वैश्यावृत्ति, घरेलू हिंसा, अपराध, तस्करी आदि की पीड़ा का अहसास और डर तब हो जब उनके अपने स्वयं के परिवार हों। अपने माता पिता आदि का परिवार छोड़कर वे अपने शिष्यों के साथ आश्रमों में आराम से बिताते हैं। वे तो सब मोह माया से दूर हैं।



वे क्या समझेंगे कि परिवार की महिलाओं, बेटियों, बहुओं और बहनों के साथ होने वाले छेड़छाड़ और अन्य अत्याचारों की पीड़ा और चिंता क्या होती है। उन्हें तो अपने और अपने आश्रम के लिए गाय के शुद्ध दूध की जरुरत होती है इसलिए सिर्फ उन्हीं की चिंता उनका एकमात्र विषय होता है। उनका अपना परिवार होता नहीं इसलिए उनके भविष्य, शिक्षा, रोजगार आदि की फिकर का कोई सवाल ही नहीं।

पदों की खोखली महिमा और लालच

गाँव, तहसील, नगर, जिला, प्रदेश आदि स्तर पर कई तरह के संगठन और दल बना दिए जाते हैं। युवा मोर्चा, दलित मोर्चा, अल्पसंखयक मोर्चा, विद्यार्थी संगठन, महिला मोर्चा, अनुसूचित जाति-जन जाति मोर्चा, मजदूर संगठन, किसान मोर्चा, अल्पसंख्यक मोर्चा आदि आदि। सभी को किसी न किसी पद से संतुष्ट कर दिया जाता है। अपने नाम के आगे बड़े बड़े पदों को जोड़कर किसी भी युवा के मन में जोश आ जाये। जितने किस्म के कार्यकर्ता और युवा इन पार्टियों में होते हैं उतने क़िस्म के संगठन या मोर्चा बना दिए जाते हैं।

ऐसे जीवन में कभी मंत्री न बन सकें लेकिन अगर किसी संगठन का मंत्री आदि बना दिया जाए तो महसूस होने लगता है जैसे हम मंत्री ही बन गए हैं। मंत्री, महामंत्री, प्रदेश कार्यकारिणी, जिला कार्यकारिणी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंडल आदि अनगिनत उपाधियाँ और पद उपलब्ध हैं। पदों के अभाव में एक नया मोर्चा, संगठन, दल या परिषद आदि बना दिया जाता है और जो असंतुष्ट हैं उनके दिल को भी ठंडक पंहुचा दी जाती है कोई न कोई पद देकर।

कुछ हासिल न हुआ तो 8-10 लोग मिलकर किसी बड़े नेताजी का फैन क्लब बना लेते हैं और आपस में ही प्रदेश या जिला स्तर के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी बनकर सोशल मीडिया में एक दूसरे को इस उपलब्धि पर बधाइयाँ देकर खुश हो लेते हैं। नेता जी भी खुश। उन स्वयं घोषित अध्यक्ष उपाध्यक्षों आदि के साथ कुछ फोटो खिंचाकर उन्हें सोशल मीडिया में बधाइयाँ आदि दे देते हैं।

हम नेताजी के लिए लड़ लड़कर उन्हें ताकतवर और अमीर बना देते हैं और एक दिन वही हमारे माईबाप और बॉस बन जाते हैं। हमें लगता है हमें उनका संरक्षण प्राप्त है। असल में वह हम पर निर्भर रहते हैं। हम उनके लिए लड़ें भिड़ें न तो वे कभी न अमीर बन पायें, न ताकतवर और न नेता। हम अपना जीवन और जवानी दोनों कुर्बान कर देते हैं लेकिन जब राजनैतिक अवसर की बारी आती है तब कोई धनी, या बाहुबली या वर्षों से विरोधी दुश्मन पार्टी का बड़ा नेता आकर हमें लात मारकर खुद बाजी मार ले जाता है।



जवानी के दिनों में हमारी आत्मा विभिन्न संगठनों के ललचाने वाले पदों से तृप्त हो जाती है। अपने जेब खर्च, मौज मस्ती, पार्टी, मुर्गा और दारू आदि के लिए पैसे मिल जाने से हम खुश हो जाते हैं। जवानी के दिनों में इसके अलावा चाहिए भी क्या होता है। चुनावों के समय अच्छा खासा पैसा पार्टी और नेताओं से हमें खर्च करने के लिए मिल जाता है, बांटने के लिए मिल जाता है। उस बंदरबांट में हमारा भी भला हो जाता है।

चापलूस, ताकतवर, बाहुबली, षड्यंत्रकारी, अपराधी लोगों का बोलबाला

30-35 की उम्र पार करते करते हम पाते हैं कि हमने कुछ हासिल नहीं किया। हासिल उन्होंने किया जो नेता जी जैसे षड्यंत्रकारी, चापलूस, ताकतवर, अपराधी और पैसे वाले होते हैं। हम उम्मीद में अपनी जवानी खर्च कर देते हैं तब तक एक नयी पीढ़ी हमारी जगह ले चुकी होती है। तब तक नेताजी इतने ताकतवर हो जाते हैं कि हम पीठ पीछे भी अपनी आप बीती किसी से बता नहीं पाते, नयी पीढ़ी को समझाना तो बहुत दूर की बात है। कोई छोटा मोटा काम धंधा हम शुरू कर लेते हैं। पुराने अनुभवों से सीखकर हम इस नेतागिरी के चक्करों से अपनी दूरियां बना लेते हैं। समाज में उठना बैठना ठीक से होता रहे इसलिए नेता जी से दुआ सलाम करनी जरुरी सी हो जाती है।

बड़े बड़े नेता, पैसे वाले लोग, व्यापारी, समाज और धर्म के ठेकेदार कभी नहीं चाहते कि हमारा स्तर कभी उठे, कम से कम उतना कभी नहीं जितने में हमें उनकी जरुरत पड़नी बंद हो जाये। क्योंकि उन सबकी दुकान चल ही रही है हम लोगों के शोषण से। परिवार में जब कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है, सरकारी अस्पताल में जब इलाज अच्छे से नहीं हो पाता तब हमें कभी कभार कोई विधायक या सांसद अपनी निधि से हमें कुछ राशि मदद के तौर पर दिलाकर हमारे ऊपर थोडा सा अहसान कर देता है। राशि दिलाने के समय वह पूरे ताम झाम के साथ सभा आदि करके, फोटो, प्रेस रिलीज आदि के माध्यम से अपनी मदद का ढोंग पीटने से पीछे नहीं हटते।

न्यूज़पेपर, सोशल मीडिया आदि में इस तरह प्रदर्शन करते हैं जैसे ये पैसा इन्होने अपनी जेब से दिया है। जनता का पैसा जनता को दिलाकर ये पूरा अहसान हमारे ऊपर जताते हैं। चेक आदि देना वाला एक होता है लेकिन चापलूसों की जितनी फ़ौज उनके आजू बाजू खड़ी होती है सबके सब अपना हाथ उस चेक आदि को देते हुए पहुँचाकर गंगा में हाथ धोने जैसे पुण्य कमा लेना चाहते हैं।

हम अच्छे से जानते हैं कि यह सब बदलने वाला नहीं है क्योंकि मेहनत तो हम भी नहीं करना चाहते। पढाई लिखाई, काम धंधा, मेहनत आदि में वर्षों लग जाते हैं। उतना न हममें सब्र होता है और न मेहनत करने की आकांक्षा। अपनी नींद में सपने ही सही लेकिन होते बड़े सुहावने हैं। कोई हमें नींद से जगाये तो हमें उस पर क्रोध आता है क्योंकि उसने हमारी नींद और उसमें देखे जाने वाले सपनों में दखल डाला होता है।

बुढ़ापा तो जैसे कटना है कटेगा, अभी सोते हुए अपने आराम और सपनों को क्यों हाथ से जाने दें। नेताओं, ठेकेदारों, उद्योगपतियों, अमीरों की एक के बाद एक पीढ़ी अपनी अपनी राजनीती और धंधे को आगे जारी रखते हैं और हम कार्यकर्ता अपनी अपनी पीढ़ी इनकी सेवा में जारी रखते हैं। ठीक वैसे ही जैसे राजाओं की औलाद राजकुमार और बाद में राजा बन जाती हैं और उनकी सेवा में लगे लोगों की औलाद उनके बाद राजकुमार और भविष्य के राजाओं की सेवा में लग जाते हैं। राजाओं और सेवकों की यह परंपरा वर्षों सदियों चलती रहती है। पहले शासन प्रशासन का स्वरूप कुछ और था अब कुछ और है। परन्तु ढांचा वही है। जमीनी हकीकत में शायद नाम मात्र का भी फरक नहीं आया है।



शासन अभी भी षड्यंत्रकारी, चापलूसों, अधिकारिओं, साहूकारों, उद्योगपतियों, अमीरों, ताकतवर, अपराधी लोगों का ही है। हम बस भ्रम में जीते हैं कि लोकतंत्र आ गया है।

कार्यकर्ता मतलब राजनैतिक गुलाम

काश मैं समझ पाता कि उद्योगपति, नेता, धर्मगुरु, धर्म रक्षक, अपराधी, पक्ष विपक्ष की पार्टियाँ आदि सभी एक दूसरे से मिले होते हैं। सबका लक्ष्य शासन और शोषण करना है। हम भोले भाले लोगों को सिद्धांतों, भक्ति, देश भक्ति के पाठ पढ़ाकर इनका लक्ष्य हमें हमेशा दरिद्र बनाये रखना होता है ताकि हम इनके षड़यंत्र को कभी समझ न पायें। ये सिर्फ यही चाहते हैं कि हम हमेशा मेहनत और मजदूरी करके इनके गुलाम ही बने रहें। चाहे वह मेहनत हम खेत खलिहानों में करें या फिर इनकी पार्टी और संगठनों में शामिल होकर रैलियों और सभाओं में इनके लिए नारे लगाकर।

पार्टी और संगठनों के माध्यम से ये हमारे मन, मस्तिष्क को भावनाओं से इस तरह गुलाम बना लेते हैं कि हमें सपने में भी शक नहीं होता कि हम इनके मानसिक गुलाम बन चुके हैं। एक महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन सम्पर्पित कर देने की जंजीरों से हमें ये इस तरह जकड़ लेते हैं कि अगर हमारे अपने सगे माँ बाप भी हमें ऐसा करने से रोकें तो हमें लगता है जैसे वे कोई पाप कर रहे हैं, देश और धर्म के साथ धोखा कर रहे हैं। क्योंकि हम स्वयं को सबसे बड़ा देश भक्त और धर्म का रक्षक मान चुके होते हैं।

हम कभी समझ नहीं पाते कि एक तरफ हमारे ही नेता धड़ल्ले से सभी तरह के बूचडखाने चलने देते हैं, देश को विश्व के सबसे बड़े बीफ निर्यातकों की श्रेणी में अग्रसर रखते हैं और दूसरी तरफ हमें गौ-हत्या के नाम पर इंसानों तक की हत्या के लिए उत्साहित किये रहते हैं। कभी कभार कोई अति-उत्साही अनपढ़ बेरोजगार गरीब नवयुवक जोश जोश में किसी की गौ-हत्या और लव-जिहाद के नाम पर हत्या कर देता है।

हमारे इन जोशीले भाइयों को लगता है कि धर्म के लिए तो रामायण और महाभारत में भी वध आदि हुए हैं। इतिहास के कई धर्मों के अनुयायियों ने धर्म के नाम पर सदियों ‘क्रूसेड’ और ‘जिहाद’ का सहारा लेकर भीषण रक्तपात किये हैं तो हमारी यह हत्याएं धर्म के लिए किये जाने वाली आवश्यक बुराई की तरह हैं जिन्हें हत्या न कहकर वध कहना चाहिए।



धर्म के नाम पर किया गया रक्तपात पाप नहीं पुण्य की श्रेणी में आता है। धर्म की जो थोड़ी बहुत समझ हमें अपने धर्मगुरुओं से मिली होती है उसका तो हमने यही मतलब समझा होता है। जब हमारे स्वयं के धर्मगुरु कहते हैं कि धर्म अलग अलग होते हैं, हिन्दू धर्म अलग, इसाई धर्म अलग, बुद्ध धर्म अलग, जैन अलग, इस्लाम अलग तो हमें भी मानना ही पड़ता है कि सबके धर्म अलग हैं और इस तरह भगवान भी भिन्न भिन्न हैं।

धर्म और जाति का पुश्तैनी व्यापार

जैसे हमारे नेता, उद्योगपति आदि कभी नहीं चाहते कि हम स्कूल में अच्छी शिक्षा पाकर पढ़े लिखे और समझदार बन जाएँ उसी तरह हमारे धर्म गुरु भी नहीं चाहते कि हम स्वयं अपने धर्मग्रंथों, वेद, पुराण, उपनिषद आदि का ज्ञान स्वयं उनका अध्ययन करके लें। लेना भी चाहें तो कहाँ से लें। जो गिने चुने संस्थान भारत देश में हमारे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कराते हैं उनमें से ज्यादातर में सिर्फ ब्राह्मण परिवार के बच्चों को ही प्रवेश का अधिकार होता है। सिर्फ वे ही संस्कृत और वेदों की पाठशालाओं में ज्ञान लेने के अधिकारी हैं।

सदियों से यह एकाधिकार उन्होंने अपने पास ही संभालकर रखा है ताकि धर्मग्रंथ, वेद, पुराण, उपनिषद और स्वयं धर्म की जो व्याख्या वे करके दें हम उसे ही सत्य ही माने और उनका पालन आँख बंद करके करें। इतिहास की तरह धर्म की समझ भी हमारी उतनी ही है जितनी हमें इनसे प्राप्त होती है। इनके अनुसार धर्म का मतलब सिर्फ भगवा झंडा, गौ-रक्षा और हमारे हिन्दू परिवार में पैदा हुए लोगों का संप्रदाय में न जाना है। ऐसा लगभग सभी तथाकथित धर्म और धर्मगुरुओं में है।

ऐसा होना स्वाभाविक भी है अगर हर व्यक्ति को धर्म, धर्म ग्रंथों, उनमें छुपे ज्ञान प्राप्त हो जायेगा तो लाखों और करोड़ों रूपये देकर इनको भागवत गीता, कुरान, बाइबिल आदि का ज्ञान देने के लिए आमंत्रित कौन करेगा या इनके मंदिरों, मठों, मस्जिदों, चर्च आदि में जायेगा कौन? इनका तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।

किसी ने शायद ठीक ही कहा है कि ये सब अलग-अलग दुकानें हैं वर्ना ये उस ज्ञान का प्रचार प्रसार करने और उसे लोगों में बांटने के रेट क्यों निर्धारित करते? नाम जरुर दान या दानराशि हो सकता है लेकिन है तो लेन देन ही। हाँ अगर इनके विद्यालयों में प्रवेश लेकर उसका सम्पूर्ण ज्ञान देने के लिए वह कोई राशि या शुल्क आदि लेते तो समझ आता कि बहुत सारे विद्यार्थियों की आवासीय, भोजन और शिक्षण व्यवस्था के लिए धन की आवश्यकता जरुरी है इसलिए वह शुल्क लिया जाता है। परन्तु ऐसा वह नहीं करेंगे। क्योंकि सिर्फ ज्ञान देना ही उनका उद्देश्य नहीं होता। ज्ञान देने के साथ साथ वह भगवान् के जैसे पूजे जाना भी चाहते हैं।



ज्ञान और शिक्षा दे देने के पश्चात् तो सभी को ज्ञान हो जायेगा कि पूजे जाने योग्य सिर्फ और सिर्फ ईश्वर है और कोई नहीं। जैसे हम व्यक्तियों के नाम अलग अलग हैं वैसे ही अलग अलग भगवान् अलग-अलग लोगों द्वारा पुकारे जाने वाले नाम मात्र हैं। काल, परिस्थिति, संस्कृति, भाषा आदि के अनुसार अलग अलग लोगों ने उसे अलग अलग तरीके से समझा और समझाया है। है सब एक।

परन्तु सभी धर्मों या संप्रदाय के ज्ञानी, गुरु, संत, महात्मा, पंडित, मौलवी, पादरी आदि यह बात जानते हैं लेकिन सबके अपने अपने एक जैसे स्वार्थ हैं इसलिए जानते हुए सभी एक दूसरे को भिन्न बताते हैं और कभी एक होने की बात स्वीकार नहीं करते।

हमें हिन्दू के नाम पर एकत्र किया जाता है। कहा जाता है कि हिन्दू राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए एक हो जाएँ। लेकिन हमें खतरा है किससे जो एक होकर लड़ने की बात की जाती है। कौन है जिससे हमें खतरा है? खुलकर कभी नहीं कहा जाता। लेकिन इशारा हमेशा मुस्लिमों की तरफ होता है इसलिए गौ-रक्षा और लव जिहाद जैसी चीजें इज़ाद की गयीं हैं। शक के आधार पर कोई मुस्लिम अगर गौ के ले जाते हुए पाया जाए तो उसे बुरी तरह पीटना और कभी कभी मार डालने जैसा कृत्य कर देते हैं। कोई हिन्दू अगर सच में गौ-हत्या और उनके बीफ के लिए उनको काटने के लिए व्यपार करता हो तो उसे बख्श देते हैं।

गौ-हत्या के लिए दोषी व्यक्ति की सजा अगर मौत ही है तो फिर वह कोई हिन्दू हो या मुस्लमान उससे क्या फरक पड़ता है? गौ-हत्या तो गौ-हत्या ही हुई। फिर इसमें वैध और अवैध बूचडखाने जैसी कहाँ से बात आती है? चाहे वैध रूप से गायों को काटा जाए या अवैध रूप से। हत्या तो दोनों तरह से गौ की हुई। सरकार के सरंक्षण, नियम और लाइसेंस के आधार पर हजारो लाखों बूचडखाने देश भर में चल रहे हैं। कोई धर्म गुरु और हिन्दू संगठन के नेता सरकार को सीधा सीधा क्यों नहीं कहने का साहस कर पाते कि सभी तरह के बूचडखाने और बीफ का व्यापार तत्काल प्रभाव से अवैध घोषित हों और उन पर कानूनी रोक लगे।



सरकार, धर्म गुरु, हिन्दू संगठन के नेता अगर यह कर दें तो हमारा कोई भी जोश से भरा युवक कभी गौ-हत्या करने वाले संदिग्ध व्यक्तियों की हत्या का दोषी नहीं बनेगा। परन्तु सरकार, धर्मगुरु, हिन्दू संगठन के नेता कभी ऐसा नहीं कर सकते। वे जानते हैं कि करोड़ों अरबों का व्यापार और रोज़गार इस पर निर्भर करता है। ऐसा कर देने से करोड़ों लोगों के रोज़गार चले जायेंगे और अरबों रूपये का विदेशी राजस्व भारत की सरकार को मिलना बंद हो जायेगा। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे देशी और विदेशी शराब के लायसेंस सरकार ही देती है और नशा मुक्त भारत का अभियान भी सरकार ही चलाती है। शराब के व्यापार से भी करोड़ों अरबों का राजस्व सरकार को प्राप्त होता है।

देशी शराब का लक्ष्य गरीबों को हमेशा दरिद्र बनाकर रखना

लोगों की संतुष्टि से जिला, प्रदेश आदि को शराब मुक्ति घोषित कर दिया जाता है। शराबबंदी लागू कर दी जाती है लेकिन शराब कभी बिकना और उपयोग में आना बंद नहीं हो पाती। सरकार और प्रशासन के संरक्षण में ही अवैध रूप से शराब बिकती है। इस तरह शराब बिकने पर सरकार, राजनैतिक पार्टियों और प्रशासन के लोगों को करोड़ों अरबों रूपये शराब को अवैध रूप से बेचने की इजाजत देने पर बनते हैं।

शराब अगर एक ख़राब चीज़ है तो उसके निर्माण पर ही हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

लेकिन राजनैतिक पार्टियों, सरकार और उद्योगपति इसी शराब को चुनाव के वक़्त मुफ्त में बांटकर रातों रात लाखों वोटों को यहाँ से वहां पलटने में माहिर हैं। गरीब और कमज़ोर तबके के अनपढ़ और नासमझ लोग जिनके वोट के आधार पर ही जीत और हार तय होती है उनके पास दिन भर की मेहनत मजदूर के बाद इतना पैसा नहीं इकठ्ठा हो पाता कि वे उस मजदूरी से अपने घर को वे सारी चीज़ें उपलब्ध करा सकें जो अच्छे जीवन यापन के लिए जरुरी होती हैं।

घर अगर 100-200 रूपये लेकर जायेंगे तो उससे घर का राशन भी ठीक से खरीदा ना जा सकेगा। इसलिए अपनी दयनीय हालातों से हारकर कुछ पल वे कच्ची और देशी शराब के 1-2 पौये पीकर रात भर के लिए शारीरिक और मानसिक तनाव से मुक्त हो लेना चाहते हैं। धीरे धीरे वह देशी शराब उनकी आदत बन जाती है। उसकी ऐसी लत पड़ जाती है कि उसके बिना जीवन असंभव सा लगने लगता है। इसलिए जब वोट डालने के ठीक 1-2 दिन पहले यही जान से भी प्यारी शराब और पौआ कहीं से प्राप्त होता हुआ दिखता है तो बदले में नेता जी की पार्टी में वोट डालना बहुत ही सस्ता सौदा मालूम होता है। इस तरह वे उसके बदले वोट नेता जी और उनकी पार्टी को डाल आते हैं।

इसलिए देशी और कच्ची शराब के 5 साल तक वैध और अवैध रूप से बनना, बिकना और गरीब तबके के मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों के द्वारा पीते रहना और उसका आदि हो जाना नेताओं के लिए जरुरी हो जाता है। पहले उनको सस्ती देशी शराब उपलब्ध कराकर उनको निर्धन, अनपढ़, गंवार, दयनीय बनाकर रखो ताकि शराब के नशे में अगर कुछ काम नहीं करते या कोई अपराध कर देते हैं तो उसके दोषी वह स्वयं कहलायें।



दूसरा, एक रूपये किलो चावल, गेहूं, नमक, बच्चों के लिए मुफ्त साइकिल, यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन, कॉपी, किताब आदि पाकर वे सरकार के प्रति अहसानमंद हो जाएँ। कहने के लिए एक गरीब को सब कुछ दिया लेकिन उस देने में उनको पीढ़ीदर पीढ़ी दरिद्र बनाये रखने का भी सारा इंतज़ाम कर दिया। अच्छी शिक्षा नहीं दी, ऊपर से सस्ती देशी शराब उपलब्ध करा दी।

एक तरफ हिन्दू एकता की बात, दूसरी तरफ जातिगत मतभेदों को बढ़ावा

आज भी पिछड़ी जाति और आर्थिक रूप से निर्धन, दरिद्र और दलित जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के बीच सम्मान प्राप्त नहीं है। सिर्फ जाति की वजह से आये दिन हमें उनको जिन्दा जला देने, निवस्त्र करके गली गली घुमाने, बलात्कार कर हत्या कर देने, मंदिरों आदि में प्रवेश से रोक देने जैसी छुआछूत जैसी घटनाएँ भारत के हर कोने से सुनने और देखने मिलती हैं।

किसी मुस्लिम युवक द्वारा हिन्दू युवती या महिला के साथ विवाह की बात तो बहुत दूर की बात है, हिन्दू युवकों द्वारा किसी दूसरी जाति की युवती के साथ विवाह करना किसी पाप से कम नहीं होता। ऑनर किलिंग किसी मुस्लिम युवक द्वारा शादी करने पर नहीं होतीं। हिन्दू युवक द्वारा हिन्दू युवती से शादी करने पर ऑनर किलिंग होती हैं। अगर किसी पिछड़ी या दलित जाति के नवयुवक ने किसी अगड़ी या उच्च जाति की लड़की से शादी कर ली तब तो समाज और जाति के सामने वह लव जिहाद से भी ज्यादा बड़ी गलती हो जाती है।

अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए किसी किसी सरकार को लाखों रूपये पुरूस्कार के रूप में तय करने पड़ते हैं तब भी कोई उच्च जाति के लोग अपने बेटे या बेटी की शादी अपने अलावा किसी और जाति में होना बर्दाश्त नहीं कर पाते। अपनी जाति में भी जब तक पूरा गोत्र मेल न खा जाए तब भी विवाह स्वीकार नहीं किया जाता।

राजनैतिक पार्टियों और नेताओं द्वारा जब किसी को टिकट प्रदान की जाती है तब वह उसके उसकी ताकत, पैसा और प्रभुत्व को तो देखते ही हैं साथ ही यह भी देखते हैं कि फलां क्षेत्र में किस जाति के लोगों की संख्या ज्यादा है। जिस जाति की संख्या सर्वाधिक होती है उसी जाति के व्यक्ति को टिकट देने का निर्णय अंत में लिया जाता है। चुनावी घोषणा पत्रों में भले ही देश और समाज से जाति और धर्म आदि आधारित भेदभाव समाप्त करने के संकल्प लिए जाते हों लेकिन चुनाव उसी आधार पर लड़े और जीते जाते हैं।

सभ्य से सभ्य और पढ़े लिखे लोग भी आज जाति पर आधारित संगठन बनाकर अपनी अपनी गतिविधियाँ अलग से संचालित करते हैं और उस आधार पर सबको एकत्रित होने और संगठित होने की बातें और कार्य करते हैं। यब सब इन्हीं राजनैतिक पार्टियों के नेताओं के प्रभाव में आकर किया जाता है। जातिगत आधार पर संगठित होने की प्रेरणा यही नेता देते हैं।



जातिगत संगठनों के पदाधिकारी जब राजनैतिक पार्टियों के बड़े बड़े नेताओं के साथ उठने बैठने लगते हैं तब उन्हें भी यह ख्याल होने लगता है कि वे किंग मेकर हैं और उनकी मदद के बिना नेताओं को उनकी जाति, जिसे वे समाज कहते हैं, के वोट मिलना संभव नहीं हो सकेगा। बहुत बार तो वे पदाधिकारी ही उसी टिकट की दौड़ में शामिल हो जाते हैं या पहले से हुए रहते हैं। अपने सांसद, विधायक और मंत्री आदि होने को वे अपनी जाति और समाज का गौरव होना सिद्ध कर देते हैं ताकि वोट हमेशा मिलती रहे। जाति और जाति के लोगों का कभी कोई भला नहीं होता। उनके जीवन में कोई क्रन्तिकारी परिवर्तन नहीं आ जाता।

बस दूसरों के सामने थोडा देंगे हांकने के काम आ जाता है। कहने और बताने के लिए हो जाता है कि फलां नेताजी, सांसद, मंत्री, विधायक आदि हमारे रिश्तेदार हैं। सामने वाला भी सोचता है कि हो सकता है रिश्तेदार हों। उनके साथ खिचायी फोटो, परिवार के किसी समारोह में नेताजी का शामिल हो जाना एक साक्ष्य के जैसे प्रस्तुत हो जाता है।

स्वदेशी और विदेशी का गणित

हमारी अपनी बहनों, बेटियों के साथ बलात्कार होता है, अपनी हवस शांत करने के बाद कई बार उनको जान से भी मार डाला जाता है, लाखों गरीब बेटियों, बहुओं और बहनों को शहर में अच्छी नौकरी का लालच देकर उनको देह व्यापार में जबरदस्ती धकेल दिया जाता है, वैश्यावृत्ति, घरेलु काम काज और उनके अंगों के अवैध व्यापार के लिए बेच दिया जाता है, हमारे अपने ही मनचले भाई आशिकी में बेटियों, बहनों, और बहुओं के चेहरे पर एसिड फेंककर उनकी जिंदगियां तबाह कर देते हैं।

इन सबकी तरफ हमारा ध्यान कभी नहीं जाता क्योंकि हमें मौका ही नहीं दिया जाता। दूसरी सभी चीज़ों का इतना ज्यादा शोर मचा दिया जाता है कि हमें आभास भी नहीं होता कि यह सब भी हमारे भारत देश में रोजाना होता है। एक तरफ हमसे चीन में बनी सामग्री को खरीदकर उपयोग न किये जाने की अपील की जाती है, दूसरी तरफ हमारी ही सरकार और नेता सरदार पटेल की 3000 करोड़ की लागत से बनने वाली मूर्ती का आर्डर चीन को ही देते हैं।

देश भर में हजारों की संख्या में बनने वाली चीजों की छोटी और बड़ी फैक्ट्री का कॉन्ट्रैक्ट चीनी कंपनियों को दिया जाता है। उनसे ही टेक्नोलॉजी खरीदी जाती है, उन्हीं के इंजिनियर्स हमारे देश में आकर उन फैक्ट्री को स्थापित करने में अपनी सेवाएं देते हैं। अरबों रूपये की सामग्री हमारी सीमा को पार करके देश में बिकने आती है। जाहिर है यह सब काम अवैध रूप से देश में प्रवेश करके तो होते नहीं हैं। भारत की हमारे सरकारें ही उनको देश में प्रवेश करने देती हैं।



विदेशों में जाकर विदेशी व्यापारियों को भारत में आकर निर्माण करने का आमंत्रण क्या सिर्फ इसलिए दिया जाता है ताकि हम जैसे गरीब और कमज़ोर लोगों की बहुत बड़ी भीड़ से सस्ते श्रमिक उनको उपलब्ध हो सकें?

एक तरफ स्वदेशी की बातें हमें सिखायी जाती हैं दूसरी तरफ विदेशी कंपनियों को भारत में ही अपने उद्योग लगाकर उनको सस्ते लेबर और भारत में उपलब्ध सस्ते कच्चे माल की उपलब्धता से उनको मालामाल करके वापस भेजना होता है। सस्ता लेबर, सस्ता कच्चा माल सब हमसे लेकर हमको ही मंहगे दामों में उस सामग्री को बेचकर ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने का न्यौता हमारे ही नेता देकर आते हैं। ऐसा तो अंग्रेजों के ज़माने में भी होता था। ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी भी यही करती थी।

न हमारा बदलना संभव है और न हमारे नेता जी का। इस यात्रा में हम बहुत आगे आ चुके हैं। अगर यह सब छोड़ा तो हमारा अहंकार ख़तम हो जायेगा। जीवन शून्य हो जायेगा। इसके बिना हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। हमारा अहंकार कैसे स्वीकार करेगा कि हम गलत रास्ते पर जा रहे थे। आखिर इसी अहंकार की लडाई तो हम अब तक लड़ते आये हैं। वर्षों से हमने सीखा भी यही सब है। कुछ दूसरी दिशा में करने का अनुभव न हमारा है और न हमारे नेताओं का। इसलिए सब जानते हुए भी यह जारी रखना अब हमारी मज़बूरी जैसी बन गया है। ये सब छोड़ देंगे तो करेंगे भी क्या। अभी कुछ तो है करने को। किसी न किसी बहाने वयस्त तो हैं। यह सब छोड़कर जीवन में कुछ भी न बचेगा।

जब तक समय और परिस्थितियां कोई अच्छा रास्ता नहीं दिखाती तब तक ऐसे ही इसी रास्ते पर चलते रहना अपने अस्तित्व को बचाए रखे रहने के लिए जरुरी है।

यह बात हम भी जानते हैं कि ये लोग भी नहीं चाहते कि कभी गौ-हत्या बंद हो, हर इन्सान को अच्छी शिक्षा मिल जाये। ऐसा अगर हो गया तो चाहे वे राजनैतिक नेता हों या धर्म गुरु सबकी राजनीति बंद हो जाएगी। सब पढ़ लिख जायेंगे तो रोजगार मांगेगे, कोई पार्टी और संगठन में शामिल होकर सड़कों पर नारे नहीं लगायेगा, गौ और लव जिहाद के नाम पर उपद्रव नहीं करेगा, राम मंदिर के नाम पर नारेबाजी नहीं होगी। लोग महिला सुरक्षा, रोजगार, किसान, मजदूर, अशिक्षा, चिकित्सा, पर्यावरण के नाम पर सरकार और पार्टी से काम करने कहने लगेंगे।



इसलिए ये न बूचडखाने बंद करेंगे और न कभी राम मंदिर बनायेंगे, न कभी समान नागरिक संहिता लागू करेंगे। ऐसा कर दिया तो इन मुद्दों की आड़ में ये अपने अवैध धंधे कैसे चला पाएंगे। इसलिए गरीब को गरीब ही बनाकर रखो, अनपढ़ को अनपढ़ ही रहने दो। इन्हें अच्छी शिक्षा देकर अपने पैरों पर कौन कुल्हाड़ी मारेगा। इन्हें बिना दिमाग वाले राजनैतिक बकरे चाहिए जिनको हट्टा कट्टा और तगड़ा बनाकर रखा जाये ताकि सड़कों पर उतारकर इनके भविष्य की बलि दी जा सके।

जय राम जी की बोलूँ या जय श्री राम बोलूँ?

गाय बिन गौसेवा – श्याम गौशाला, पोटूल, औरंगाबाद

कुछ समय पहले तक मुझे समझ नहीं आता था कि आजकल ये गौ-रक्षा का इतना शोर क्यों है देश में। सिर्फ गाय की ही रक्षा क्यों? बाकी सभी पशु पक्षियों की रक्षा क्यों नहीं? क्यों बाकी पशु जैसे बकरा, मुर्गा, भैंस, भेड़ आदि के प्रति वो भाव नहीं जो गाय के प्रति है? हिन्दू धर्म में तो किसी भी जीव के प्रति हिंसा या उनकी हत्या वर्जित है, पाप है। सिर्फ गाय के प्रति हमारी धार्मिक आस्था इतनी ज्यादा क्यों जुडी हुई है?

इन सवालों के उत्तर मुझे कुछ दिन पहले देश की कुछ गौ-शालाओं में भेंट के दौरान प्राप्त हुआ। इससे मेरी बाकी जानवरों के प्रति सहानुभूति कम नहीं हुई है। आज भी व्यक्तिगत रूप से मैं किसी भी पशु या पक्षी की हत्या या उनके प्रति क्रूर व्यवहार का पक्षधर नहीं हूँ। लेकिन, मुझे उस प्रश्न का वैज्ञानिक, व्यवहारिक, सामाजिक, पर्यावरण, आर्थिक और धरती पर जीवन आदि द्रष्टिकोण की गहरी समझ प्राप्त हुई। इससे यह समझ में आया कि क्यों हमारे धार्मिक ग्रंथों में गाय को माता का दर्जा प्राप्त है। वह बिना वजह या कारण कामधेनु नहीं कहलाती।



असल में जिन अंग्रेजी स्कूल, कॉलेज और सांस्कृतिक माहौल में हम जन्मे और बढे हैं उसके द्वारा पहनाये गए चश्मे से हमें हर वो चीज़ जो हमारी अपनी संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं की है वो पिछड़ी लगती है। और हर वो चीज़ जिस पर पश्चिमी देशों, उनकी संस्कृति, वैज्ञानिकों आदि की सील ठप्पा लगी होती है उसे हम विकसित, व्याहारिक और आधुनिक मानते हैं। पश्चिमी संस्कृति के प्रचार प्रसार के परिणाम स्वरूप हमने अपनी हर चीज़ को अन्धविश्वास के नज़रिए से देखा है और उसका उपहास किया है।

आधुनिक और अंग्रेजी स्कूल, कॉलेज में पढ़कर तथा बड़े शहरों की पाश्चात्य संस्कृति में कुछ वर्ष काम करने और रहने के दौरान हमारा आचार, व्यवहार, बोली, सोच, समझ और द्रष्टिकोण ठीक वैसा हो जाता है जैसा अंग्रेजों का भारत के आम भोले भाले लोगों के प्रति हुआ करता था – हीन। मेरा भी यही हाल था।

स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था का आधार गाय

बहुत लोगों को यह शीर्षक पचाने में तकलीफ हो सकती है कि कैसे गाय लोगों की, धरती की, जंगलों की, खेतों की मिटटी के स्वास्थ्य और गाँव, प्रदेश, देश और विश्व की अर्थव्यवस्था का मूल आधार है जिसे आधुनिक समाज ने जड़ मूल से नष्ट करने का आत्मघाती प्रयास पिछले कई सालों में किया है।

इस बात से कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता कि आज जो अनाज, भोजन, फल-फूल, दूध, जल आदि का सेवन वह कर रहा है वह ज़हर (रासायनिक खाद और कीटनाशकों) से भरा पड़ा है। यह सब हमारी प्यारी आधुनिकता की देन है। इसका सिर्फ एक ही समाधान है – गाय से प्राप्त गोबर और गोमूत्र का जैविक खाद और कीट नियंत्रक के रूप में उपयोग। इन रासायनिक खाद और कीटनाशकों से इंसान के स्वास्थ्य के साथ साथ मिटटी, पानी और हवा का भी सत्यानाश हुआ है।

देसी गौवंश का गोबर और गोमूत्र ही क्यों?

इन बहुत साधारण शब्दों में सिद्ध हो जाता है कि कैसे गाय हमारे, धरती के, मिटटी, पानी और हवा आदि के भी स्वास्थ्य का मूल आधार है। आधुनिक विज्ञान की प्रयोगशालाओं में प्रयोग और अनुसन्धान के बाद यह सिद्ध हुआ है कि मिटटी की उर्वरता और उसकी प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने के लिए जितने पोषक तत्वों की जरुरत होती है वे सब के सब देसी गौवंश और गोमूत्र में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं।

जर्सी, होलिस्टीन आदि विदेशी गायों, भैंस, बकरी, भेड़, घोडा आदि जानवरों के गोबर और मूत्र का भी प्रयोगशालाओं में परीक्षण हुआ है। सभी तरह के प्रयोगों के बाद यह सिद्ध हुआ हुआ है कि देसी गाय के गोबर और गोमूत्र में जो पोषक तत्व हैं वे दुनिया के किसी जानवर में नहीं हैं। गाय का गोबर एक तरफ पोषक तत्वों का भण्डार है, दूसरी तरफ गोमूत्र में हजारों तरह की बीमारियों को ठीक करने का धनवंतरी (चिकित्सक) मौजूद है।

कृष्ण भगवान कभी भैंस, बकरी आदि चराते और पालते क्यों नहीं दिखाए गए

“गोमय वसते लक्ष्मी, गोमूत्रे धनवंतरी”, इसलिए ऐसा हमारे शास्त्रों में उल्लेख है। श्रीकृष्ण भी इसी कारण गाय, बैल और बछड़ों को जंगलों में चराते देखे गए हैं। उनकी और गोकुल की किसी गौशाला में कभी देसी गाय के अलावा भैंस, बकरी और अन्य कोई जर्सी गाय जैसा पशुधन नज़र नहीं आया। गाय मतलब देसी गाय। हमारे देश में जर्सी गाय को गाय नहीं मानते क्योंकि वह गाय है ही नहीं। हर चीज़ की तरह विदेशी संस्कृति के लोगों ने जर्सी गाय को हमारे ऊपर थोपा है ताकि हम अपने स्वयं के धन को कचरे में फेंककर उनके कचरे को सोना समझकर अपने पास रखने लगें।

दुनिया भर में आज जिस ‘A2 मिल्क’ को सबसे ज्यादा पौष्टिक कहा जाता है वह सिर्फ देसी गाय से ही प्राप्त होता है। बाकी किसी गाय या भैंस से यह दूध नहीं मिलता। फैट और गाढे दूध के प्रेम में हम अंधे हो चुके हैं।

हम खरीदते नहीं हैं, हमें हर चीज़ बेची जाती है

चाहे लक्स का विज्ञापन दिखाती खूबसूरत अभिनेत्रियाँ हों, कोलगेट का विज्ञापन में नाचती कोई खूबसूरत युवती जो मुंह से कोलगेट भरी साँसों से भरे युवक के प्रति खिंची चली आती हो, या अन्य कोई छोटा और बड़ा उत्पाद – हम हर चीज़ विज्ञापन देखकर खरीदते हैं। पढ़े लिखे और समझदार होने का इससे कोई लेना देना नहीं। बहुत समझदार लोग भी 24 घंटे हमारी मानसिकता पर थोपे जाने वाले भ्रामक विज्ञापनों के चंगुल में फंस जाते हैं।

हमें समझ नहीं आता कि विज्ञापन में जिस डॉक्टर को दिखाया जा रहा है असल में वह डॉक्टर नहीं एक कलाकार है जो डॉक्टर की एक्टिंग कर रहा है। बस उस भ्रामक विज्ञापन में दिखाया जाता है कि समझदार माँ अपने परिवार के सभी लोगों के स्वास्थ्य के लिए बाज़ार से कोलगेट खरीदकर लाती है। अब कौन सी माँ है जो स्वयं को समझदार कहलाना पसंद नहीं करेगी? इस तरह समझदार माँ का मापदंड हो जाता है उन सारे उत्पादों को खरीदकर इस्तेमाल करना जो विज्ञापन में समझदार माँ वाले विज्ञापन में दिखाए जाते हैं।

हमें हर चीज़ बेची जाती है – हमारे अंतस मन पर लगातार हो रहे विज्ञापनों की मार से। हम 100 में शायद 1 चीज़ मुश्किल से स्वयं खरीदते हैं। ऐसा हर उत्पाद के साथ है। जिस उत्पाद का जितना ज्यादा विज्ञापन वो उतनी अच्छी। जिसका विज्ञापन जितना कम उसकी गुणवत्ता उतनी ही कम। यही हम आज का मापदंड।

देसी गौवंश बचाना क्यों जरुरी?

अगर देसी गौवंश बचेगा तो ही हमें और हमारी पीढ़ियों को शुद्ध दूध, शुद्ध जैविक अनाज, सब्जी, फल-फूल, शुद्ध वायु और जल आदि मिलेगा। जितना ज्यादा गोबर इस धरती को मिलेगा वो उतनी ही ज्यादा उपजाऊ बनेगी। पेड़ों की संख्या वैसे भी लगातार कम हो रही है। ऊपर से जो धरती को मिलने वाला गोबर का पोषण है वह भी गौवंश के लगातार काटे जाने की वजह से कम हो रहा है। गाय जंगलों में चरने जाने की जगह अब गाँव और शहरों के कचरे के ढेर में पड़ी पोलिथीन में खाने की सामग्री ढूढती ज्यादा नज़र आती हैं।



कंक्रीट के जंगल यानि हमारे नगर और शहरों में अगर गाय गोबर करती भी है तो उसका कोई मतलब नहीं। क्योंकि वह मिटटी में तो मिल नहीं पाता। हर जगह को हमें कंक्रीट से ढँक दिया है। पहले जब गायें जंगलों में चरने जाती थीं तब वहां की भूमि उनके गोबर और मूत्र से प्राकृतिक रूप से उपजाऊ हो जाया करती थीं और जंगल हमेशा हरे भरे रहते थे। गाँवों में उपस्थित चारागाह और मैदान भी हमने छीनकर उनपर कब्ज़ा कर लिया है। हमारा प्लास्टिक खाकर गाय रोज़ मर रही हैं। दूध कम या न देने पर हम गाय, उसके बछड़े आदि को सड़क पर छोड़ देते हैं। गिद्ध की नज़र गडाए कसाई और उनके दलाल एक एक करके उन गायों और बछड़ों को काटे जाने के लिए भेज देते हैं।

गौ हत्या का दोषी हर व्यक्ति है। हमारा प्लास्टिक उसे मार रहा है और जिसने गौवंश को सड़कों पर छोड़ा है। वह जिम्मेदार है उसकी गाय या बछड़े को कोई कसाई या उसका दलाल काटे जाने के लिए उसकी तस्करी करता है।

हत्या, हिंसा, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, बढ़ता भ्रष्टाचार, सूखा, बाढ़, रासायनिक ज़हरीला भोजन, वायु और जल प्रदूषण, आतंकवाद, वैमनस्यता, नफरत, अशांति – ऐसी और अन्य तमाम समस्याएं हमारे द्वारा किये गए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष गौ-हत्या का दुष्परिणाम हैं।

बिना गाय पाले गौ सेवा कैसे करें

अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदार समझते हुए यह सुनिश्चित करें कि हमारे गाँव, मोहल्ले, नगर में कोई गौवंश लावारिस ना घूमे, गाँव और तहसील स्तर पर एक गौशाला का प्रबंध करें जिसको चलने की जिम्मेदारी सभी की है – ऐसा भाव अपने ह्रदय में लायें।

स्वयं गाय अगर न पाल सकें तो गौशाला में बनने वाले उत्पादों जैसे – नहाने का साबुन, ज़हर मुक्त मच्छर भगाने वाली कोईल, धूप बत्ती, फेसपैक, गमलों के लिए वर्मी कम्पोस्ट खाद, जैविक कीट नियंत्रक, कम्पोस्ट खाद आदि खरीदकर इस्तेमाल करें।

देसी गाय का A2 मिल्क इस्तेमाल करें, गौशल में बनने वाले गाय के गोबर के कंडों से पूजा के समय घी और चावल से छोटा सा हवन करें (हवन करने के वैज्ञानिक फायदे हैं)।

अगर आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम हैं तो गौशाला किसी किसी न किसी रूप में मदद करें। हम जब अपने ही क्षेत्र की गौशाला में अपनी इसी तरह की भागीदारी रखेंगे तो हमें यह भी पता चलेगा कि गौशाळा के नाम पर कहीं कोई धांधली तो नहीं चल रही। हमारी सतत निगरानी, भागीदारी और सहयोग गौशाला को अच्छे से चलने के लिए प्रेरित करेगी।

 

गौशाला में बनने वाले दैनिक जीवन उपयोगी सामानों को बनाने का प्रशिक्षण

देश में ऐसी कई गौशालाएं हैं जो गाय को सच में माता मानकर उनका ख्याल रख रही हैं। इन गौशालाओं में किसानों, युवाओं आदि को जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न खादों और कीट नियंत्रकों को बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

इस अत्यंत उपयोगी प्रशिक्षण से किसान की मार्केट पर खाद और कीट नियंत्रण के लिए निर्भरता शून्य हो जाती है और उसके लाभ में बढ़ोत्तरी होती है। उसकी पैदावार बढ़ने के साथ साथ फसल पूर्ण रूप से शुद्ध भी होती है जिसका उसे मार्किट में ज्यादा दाम भी मिलता है।  खेतों की मिटटी जो रासायनिक खाद और कीटनाशकों की वजह से खुद ही धीरे धीरे नष्ट होती जा रही है, उसका जीवन भी देसी खाद और कीट नियंत्रकों के प्रयोग से बच सकेगा।

मल्टीनेशनल कंपनियों और दलाल नेताओं का षड़यंत्र

अभी किसान खेती इसलिए छोड़ रहा है क्योंकि उसे फसल के सही दाम नहीं मिलते, बाज़ार से खाद और कीटनाशक खरीदने पड़ते हैं। धीरे धीरे एक और कारण खेती छोड़ने के कारणों में शामिल हो जायेगा। वह है खेत की मिटटी का बंजर हो जाना। तब यह जमीन कौड़ी के दाम दलाल नेता खरीदकर बड़े बड़े नेशनल और मल्टीनेशनल उद्योगपतियों को बेच देंगे।

ये उद्योगपति अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और विकसित देशों की भांति किसानों द्वारा खरीदी गयी कौड़ियों के दाम वाली जमीन को देसी खाद और कीट नियंत्रकों से सुधारकर पूर्ण जैविक खेती करेंगे। उनके पास उपलब्ध अपार और प्रचुर आर्थिक शक्ति से सभी तरह की मशीनें और तकनीक के इस्तेमाल से जैविक अनाज, सब्जी, फल और अन्य सभी खाद्य पदार्थ उत्पन्न कर आम जनता को बढे दामों पर बेचेंगे। आम आदमी और किसान सिर्फ एक ग्राहक बनकर रह जायेगा।



इसी षड़यंत्र के रहते नेता और सरकार एक ओर किसानों को क़र्ज़ तले दबाये बैठे हैं, फसलों के सही दाम नहीं दे रही, दूसरी तरफ मल्टीनेशनल कंपनियों को बाज़ार में रासायनिक खाद और कीटनाशक रुपी ज़हर बेचने दे रहे हैं ताकि किसानों की जमीन बंजर हो जाये और वे कौड़ी के दाम नेताओं और सरकारों को अपनी जमीन बेचकर मजदूरी और अन्य दूसरे कामों में लग जाएँ।

बचने का क्या है रास्ता

रास्ता बड़ा सरल है। किसान इस आपातकालीन स्थिति को पहचानें और देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बनने वाले सभी तरह की खादों जैसे वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद), कम्पोस्ट, जीवामृत, दशपर्णी अर्क, वर्मी वाश, S-9 कल्चर, गो-मूत्र-नीम कीट नियंत्रक, समाधी खाद, सींग खाद, घन जीवामृत, अग्नि अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, नीम पेस्ट, एंजाइम, आदि बनाना सीखे और उनका उपयोग अपने खेतों में करे।

बीज, खाद और कीटनियंत्रक आदि खरीदने के लिए ही किसान क़र्ज़ लेता है। अगर यह सब वह स्वयं बनाना सीख ले तो उसकी बाज़ार और क़र्ज़ पर निर्भरता ख़तम हो जाएगी। जैविक खाद्य उत्पादों की बिक्री से उसे ज्यादा दाम मिलेंगे और जमीन की उर्वरता बनी रहेगी।

श्याम गौशाला, पोटूल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)  

औरंगाबाद से 25 किलोमीटर दूर पोटूल ग्राम में श्याम गौशाला में इन सभी उत्पादों को बनाने का व्यवहारिक ज्ञान 2 दिवसीय प्रशिक्षण प्रत्येक माह दिया जाता है। इन खाद और कीट नियंत्रकों के अलावा, पंचगव्य साबुन, दंतमंजन, गोनायल, उबटन, धूप बत्ती, मच्छर बत्ती, अग्निहोत्र कंडे आदि दैनिक जीवन की सामग्री को बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इन अन्य उत्पादों को बनाकर किसान अपनी आय में वृद्धि कर सकता है।

प्रत्येक माह होने वाले प्रशिक्षण की जानकारी श्याम गौशाला के संचालक श्री सुधीर विद्वांस से ली जा सकती है। उनका फ़ोन नंबर है + 91 94227 08331 .  देश के हर राज्य से ग्रामीण और शहरी नवयुवक, किसान आदि प्रत्येक माह प्रशिक्षण लेने श्याम गौशाला जाते हैं।

पूरा पता :

श्याम गौशाला,

डोणगांव, पोटूल रेलवे स्टेशन के पास,

वाया टाकलीवाडी, तहसील – गंगापुर, जिला औरंगाबाद (महाराष्ट्र)

सम्पर्क सूत्र  –

श्री सुधीर विद्वांस – 94227 08331

श्री धनञ्जय धामने – 94222 03190