नदी पुनर्जीवन, जल संरक्षण और नदी घाटी प्रबंधन की अंतर्राष्ट्रीय पाठशाला – तरुण भारत संघ

तरुण भारत संघ राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा ग्राम में एक ऐसा संगठन है जिसने राजस्थान और महाराष्ट्र समेत देश और विदेश के लाखों गांवों को पानीदार बनाया है। सूखाग्रस्त गांवों और जगहों को पानीदार बनाने की यह गंगा सतत बह रही है।

लगभग 40 साल पहले एक नौजवान अपने 3 मित्रों के साथ इस धरती को कुछ वापस देने के संकल्प से एक बस में चढा और बस के कंडक्टर से कहा की इस बस का जहाँ भी आखिरी स्टॉप हो वहां हमें छोड़ देना। बस ने उन्हें किशोरी गाँव में छोड़ा जो उस बस का आखिरी स्टॉप था। रात उन्होंने एक मंदिर में बितायी। वे अगली सुबह सरकारी स्कूल के हेड मास्टर सुमेर सिंह से  मिले। उन्होंने हेड मास्टर से कहा की हम गाँव में लोगों के लिए कुछ समाज सेवा का कार्य करना चाहते हैं।



तय किया गया कि चारों मित्र चार अलग अलग दिशाओं में स्थित ऐसे गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ने का कार्य करेंगे जहाँ स्कूल नहीं हैं। डॉ राजेंद्र सिंह पेशे से एक चिकित्सक हैं इसलिए उन्होंने ग्राम गोपालपुरा में लोगों के इलाज और शिक्षा का काम शुरू किया। बच्चों को पढ़ने के बाद गाँव के बुजुर्ग लोगों के साथ बैठक होती थी जिसमें इन कार्यों के बारे में विचार विमर्श हुआ करता था।

मांगू काका

राजस्थान का यह इलाका सूखाग्रस्त था। पीने का पानी लाने के लिए परिवार की महिलाओं और बेटियों को कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता था। शिक्षा और स्वास्थ्य से पहले इस क्षेत्र को पानी की जरुरत थी – पानी पीने के लिए और खेतों में सिंचाई के लिए। नष्ट हो चुके जंगलों और नदियों के अतिक्रमण से यह इलाका सूख चुका था। गाँव के बुजुर्ग मांगू काका, जिनकी उम्र लगभग 72 वर्ष के आस पास रही होगी, ने युवा राजेंद्र सिंह से कहा कि, “अगर तुम्हें कुछ काम ही करना है तो कल गेंती और फावड़ा लेकर आना। तुम्हें पानी का काम करना है।” राजेंद्र सिंह ने कहा कि उन्हें तो यह काम आता नहीं है। मांगू काका ने कहा कि, “यह काम मैं तुम्हें सिखाऊंगा।”

राजेंद्र सिंह ने जब अपने 3 युवा साथियों से इस बारे में बात की तो वे इसके लिए राजी नहीं हुए और वापस चले गए। परन्तु राजेंद्र सिंह दूसरे दिन मांगू काका के पास पहुँच गए। मांगू काका राजेंद्र सिंह को एक कुंये पर लेकर गए। चमड़े के चरसे के सहारे मांगू काका ने राजेंद्र सिंह को कुएं में उतर दिया। कुएं में पड़ी विभिन्न दरारों (fractures) को दिखाकर बताया की कैसे धरती के अन्दर पानी जाता है और हमारे सभी स्रोतों जैसे कुओं, तालाब, नदी और भूमिगत जल के भंडारों को पानी से भरे जाते हैं। इस तरह ऐसे कई कुओं में मांगू काका ने राजेंद्र सिंह को उतारा और पानी का काम सिखाया।

हमें सिर्फ वोट दो बाकी सभी काम हम करेंगे

राजेन्द्र सिंह ने मांगू काका से कहा जब आपको यह काम आता है तो आप ही यह काम क्यों नहीं करते। मांगू काका ने कहा कि, “सदियों से यह काम हम गाँव वाले मिलकर ही करते थे लेकिन अंग्रेजों से स्वंतत्रता के पश्चात् जब से सरकारें आयी हैं तब से गाँव बिखर गए। सरकारों ने कहा कि आप लोग हमें सिर्फ वोट दीजिये, आपके सारे काम हम करेंगे। लोगों को और क्या चाहिए था। उन्होंने वोट दीं और उम्मीद लगाये हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे कि सरकारें हमारे लिए काम करेंगी। परन्तु सरकारों ने क्या काम किये इससे हर कोई वाकिफ है।”

“सरकारें लोगों को आपस में जाति, धर्म आदि के नाम पर बांटती रहीं ताकि पहले की तरह गाँव के लोग इकठ्ठा ना हो सकें। दूसरा – अगर मैं गाँव वालों से कहूँ कि हमें यह काम करना है तो उनको लगेगा मेरा इसमें कोई स्वार्थ है इसलिए मैं लोगों को इकठ्ठा कर रहा हूँ। इसलिए मेरी बात गाँव वाले नहीं सुनेंगे। तुम बाहरी आदमी हो। तुम किसी के नहीं हो इसलिए तुम सबके हो। तुम्हारी बात लोग सुनेंगे क्योंकि तुम पानी का काम करते हुए कुछ लेकर नहीं भाग सकोगे।”

जौहड़

राजस्थान की धरती पर भागीरथ की तरह राजेन्द्र सिंह जी ने पानी का काम अकेले शुरू किया। गाँव में एक जौहड़ बनाई गयी। बारिश का पानी इस जौहड़ में इकठ्ठा हुआ। इस जौहड़ से नीचे के सारे कुएं जो सूख गए थे वे रिचार्ज होकर पुनः पानी से भर गए। परिणाम देखकर लोगों में नयी ऊर्जा का संचार हुआ और लोग बढ़ चढ़कर इस काम में सहयोग देने लगे।

अरवरी नदी का पुनर्जीवन और जन आन्दोलन

जल संरक्षण और जल संवर्धन का काम करते रहने से सूखी अरवरी नदी पुनर्जीवित हो गयी। वह पानी से भर गयी। जहाँ पानी होता है वहां हर तरह का जीवन अपने आप पनपने लगता है। उस नदी में मछलियाँ भी आ गयीं। गिद्ध जैसी नज़र गडाए नेताओं ने मछली पकड़ने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया। जब गाँव वालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया। परन्तु नियम कानून और पुलिस का सहारा लेकर गाँव वालों की आवाज को दबाने का पूरा प्रयास किया गया।

चूंकि गाँव वालों ने नदी को पुनर्जीवित करने में बहुत मेहनत की थी इसलिए आसानी से उनको चुप करना संभव नहीं था। आसपास के सभी गाँव वाले ने संगठित होकर बड़ा जन आन्दोलन किया और सरकार को जनता की ताकत के आगे झुकना पड़ा। ठेका रद्द कर दिया गया।

नदी संसद

राजेंद्र सिंह जी ने कहा कि इस बार तो हमने आन्दोलन करके नदी को बचा लिया लेकिन यह संकट तो बार बार आएगा। इसके लिए हमें कोई मजबूत और स्थायी समाधान खोजना होगा। इस हेतु अरवरी नदी के आस पास के गाँव के लोगों की एक संसद बनाई गयी जिसे अरवरी नदी संसद नाम दिया गया।

संसद के 11 नियम तय किये गए जिसका पालन करना सबके लिए अनिवार्य किया गया। जैसे –

  1. कोई भी नदी से सीधे पानी सिंचाई के लिए नहीं उठाएगा,
  2. नदी के कैचमेंट एरिया में कम पानी वाली फसलें बोई जाएँगी,
  3. ज्यादा पानी मांगने वाली फसलें नहीं लगायी जाएँगी,
  4. कोई भी हरी लकड़ियाँ नहीं काटेगा, अगर किसी को लकड़ी की जरुरत होगी तो गाँव की सभा बैठकर इजाज़त लेकर लकड़ी ले सकेगा,
  5. गाँव की जमीन बाहर के लोगों को नहीं बेचेंगे आदि।  

आसपास की जमीन बड़े उद्योगपति खरीदकर सारा पानी इस्तेमाल कर लेते हैं और गांवों को पानी के लिए मोहताज होना पड़ता है। (ऐसा आज भी हर जगह हो रहा है। बड़े बड़े बांधों का निर्माण उद्योगपतियों की फैक्ट्री और उद्योग धंधों को पानी देने के उद्देश्य से किये गए हैं। बदले में उसी नदी में अपने उद्योगों का कचरा और ज़हरीला पानी नेताओं, अधिकारीयों की जेबें भरके छोड़ते हैं और गाँव के साथ साथ क्षेत्र की सम्पूर्ण जैव विविधता को नष्ट करके पारिस्थिति तंत्र को समाप्त कर देते हैं।



हर साल जून और दिसम्बर में नदी संसद की बैठक होने लगी, जिसमें पिछले 6 महीने किये गए कार्यों की समीक्षा और आने वाले 6 महिनों में किये जाने वाले कार्यों की रूपरेखा तैयार की जाती थी।

रुकावटें और चुनौतियाँ

रुकावटें पहले भी थीं और आज भी हैं। भ्रष्ठ सरकारी तंत्र नहीं चाहता की सदियों से वनों, नदियों, तालाबों और जल संरचनाओं का पारंपरिक तरीके से बचाए रखने का कार्य गाँव के लोग और जंगलों में रहने वाले आदिवासी आदि करते आये हैं, उनके सामने नियम कानून के तरह तरह के अड़ंगे डालने का प्रयास करता रहता है। क्योंकि जब गाँव वाले मिलकर यह कार्य कर लेते हैं तो भ्रष्ट लोगों को अपनी जेबें भरने का मौका नहीं मिल पाता। परन्तु गाँव वालों की एकता और संगठन के सामने भ्रष्ट लोगों की दाल नहीं गल पाती।

हमें तरुण भारत संघ से क्या मिल सकता है?

तरुण भारत संघ उस गंगा के समान है जिसे भागीरथ अपनी तपस्या से इस धरती पर लाये थे। वर्तमान युग में अगर भागीरथ से साक्षात्कार करना है तो तरुण भारत संघ के संस्थापक स्टॉकहोल्म वाटर प्राइज 2015 और 2001 रेमन मेगसेसे अवार्ड से सम्मानित श्री राजेंद्र सिंह जी और उनकी तपोभूमि तरुण भारत संघ, भीकमपुरा में एक बार भेंट करें।

स्कूल और कॉलेज की किताबों में हमने बहुत पढ़ा और लिखा होगा कि कैसे पानी और नदियों को बचाना है। इस विषय में यूनिवर्सिटी की पीएचडी भी इतना व्यवहारिक ज्ञान नहीं दे सकेगी जितना तरुण भारत संघ के आश्रम में की गयी 2-3 दिन की यात्रा और भेंट।

भगवान मतलब

 भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि, न से नीर

जल के बिना जीवन क्या होता है, जल आने से कैसे जीवन पुनः जीवित हो जाता है, एक नदी को जीवित रहने या रखने में उप नदियों, उसकी बालू, आसपास के जंगलों और पेड़ पौधों का कितना बड़ा योगदान होता है। जहाँ जल का संकट नहीं है, अगर वहां के लोग और किसान चाहते हैं की आने वाले निकट भविष्य में पानी का संकट न आये, तथा ऐसे क्षेत्र जहाँ जल का संकट है जैसे बुंदेलखंड आदि, अगर यहाँ के लोग सीखना चाहते हैं कि कैसे बेपानी जगह को पानीदार बनाया जाता है तो तरुण भारत संघ की यात्रा जरुर करें।

अगर यह धरती माँ है तो नदी और उपनदियाँ उसके शरीर में फैली नसें या धमनियाँ हैं जिससे धरती का रक्त यानी जल पूरे शरीर में प्रवाहित होता है। पेड़ और जंगल धरती माँ के फेंफडे हैं जिनका काम है जीवन जल को शरीर के सारे अंगों में प्रवाहित करना।

निःशुल्क प्रशिक्षण

संस्था में जल संरक्षण, जौहड़, बांध आदि बनाने के महत्व के बारे में व्यवहारिक ज्ञान देने के साथ साथ जरुरतमंद किसानों, आमजनों, छात्र छात्रों, समाज सेवी संगठनों आदि को प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इस हेतु जानकारी के लिये संस्था के पते या फोन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

तरुण भारत संघ

ग्राम – भीकमपुरा (किशोरी)

जिला – अलवर, राजस्थान – 301 022

ईमेल – jalpurushtbs@gmail.com

फ़ोन – + 91 9636775645,   9414019456, 7597914465, 9414066765

वेबसाइट : www.tarunbharatsangh.in

 



ग्राम स्वराज, किसान आत्मनिर्भरता, जैविक कृषि और गौ-रक्षा की पाठशाला ‘गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र’ देवलापर

देश भर में गाय की रक्षा सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और व्यवसायिक आदि क्षेत्र में एक ज्वलंत विषय बना हुआ है। राष्ट्रीय मीडिया में हमें गौ-रक्षा को लेकर विभिन्न ख़बरें देखने और सुनने मिलती हैं। इन सब पर हर व्यक्ति की तरह तरह की प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया में भी आये दिन नज़र आती हैं।

अंग्रेजी संस्कृति और सभ्यता के अन्धानुकरण, भौतिक और आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में हम स्वतंत्रता के बाद से जब से भटके हैं तब से आज तक हम और हमारा देश भटकता ही जा रहा है और यह अंधी दौड़ न थमने का नाम ले रही है और न ही उसकी रफ़्तार कम हो रही है। इस रास्ते पर कोई स्पीड ब्रेकर भी नहीं नज़र आ रहे।

अंग्रेजी शिक्षा पद्धति और हर चीज के बाजारीकरण ने अच्छी चीज को भी सिर्फ इसलिए पिछड़ा समझकर नकार दिया है क्योंकि उस पर पश्चिमी देशों और संस्कृति की मोहर नहीं लग होती। अगर बेकार और नुकसानदायक कार्य पर पश्चिमी देशों की हामी भरी मोहर लगी हो तो हम उसे आधुनिक और विकसित कहलाने के लिए आंख बंद कर अपना लेते हैं।खेती और पशुपालन (गौवंश) हमारे देश की रीढ़ की हड्डी हैं।

हमारा देश आज भी कृषि पर निर्भर है। देश की 70 प्रतिशत से ज्यादा जनसँख्या कृषि और आधारित व्यवसाय से अपनी आजीविका अर्जित करता है। हरित क्रांति की अंधी दौड़ में हमने अपनी जमीन, अनाज, सब्जी, खाद्य पदार्थ और लोगों के स्वास्थ्य के साथ जो खिलवाड़ किया है उसके परिणाम स्वरूप देश भर में ऐसी ट्रेन चल रही हैं जो मरीजों से भरी पड़ी हैं। पंजाब जैसे राज्य में तो कैंसर से पीड़ित मरीजों को ले जाने वाली ट्रेन का नाम ही कैंसर ट्रेन पड़ गया है।



जिसकी पूजा उसी की दुर्दशा

यही दुर्दशा हमने अपने गौवंश की भी की है। 3-4 पीढ़ियों से अंग्रेजी सभ्यता का अनुकरण करते करते हम भी लगभग अंग्रेज बन चुके हैं। हजारो गौवंश काटे जाने, उसके मांस का व्यापार किये जाने के लिए सड़कों पर या तो छोड़ दिए जा रहे हैं या फिर पैसे के लिए बेच दिए जा रहे हैं। उस पर हम अपने आराध्य कृष्ण भगवान् की पूजा भी रोज सुबह शाम करते हैं। वे श्री कृष्ण जो स्वयं गौ को अपनी माता मानते थे। हम भी गौ को माता कहते हैं। लेकिन हम सिर्फ कहते बस हैं। गाय की तरह हम स्त्री, नदियों, प्रकृति, देश आदि को भी माता का दर्जा देते हैं। लेकिन जिसकी हम जितनी पूजा करते हैं उसकी उतनी ज्यादा दुर्दशा करते हैं या होते हुए देखते रहते हैं।

देश भर में ऐसी बहुत सारी गौ-शालाएं नज़र में आ जाती हैं जो सेवा के नाम पर सिर्फ पाखंड कर रहे हैं। असल में उनका मकसद इसके माध्यम से सिर्फ आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक लाभ अर्जित करना मात्र होता है।

उम्मीद की किरण – गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र,  देवलापर,  नागपुर

जबलपुर-नागपुर हाईवे पर नागपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर देवलापर ग्राम में लगभग 65 एकड़ भूमि पर गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र स्थापित है जो 1996 से स्वचालित है। यह अनुसंधान केंद्र आज के भ्रमित तथाकथिक आधुनिक युग में भारतीय गौ-कृषि और ग्राम स्वराज के लिए एक उम्मीद की किरण के रूप में वर्षों से कार्यरत है।

“मार्च 2018 में जैविक खेती और गौ-वंश आधारित स्वाबलंबन के लिए 5 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण शिविर में सम्मिलित होने से पहले औरों की तरह मेरी भी व्यक्ति धारणा यही थी कि देश में देसी गौ-वंश के नाम पर सिर्फ आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक लाभ लेने वाले व्यक्ति, संगठन, कार्यकर्ता, नेता और पार्टियाँ मौजूद हैं, गौ-रक्षा केवल एक पाखंड है, आदि आदि।“

“देश के सभी राज्यों से लगभग 120 पुरुष और महिलायें इस प्रशिक्षण में सम्मिलित हुए। देसी गौवंश के धार्मिक पहलू से तो लगभग हम सभी थोड़े बहुत परिचित हैं परन्तु उसके वैज्ञानिक, व्यवहारिक, आर्थिक पहलू के सम्बन्ध में मेरा ज्ञान लगभग शून्य था। मैं भी यही समझता था की गाय मतलब दूध, बैल मतलब खेत में हल, गोबर मतलब कंडे और गोबर गैस। बस। चूंकि अब खेतों में अब बैल से चलने वाले हल का स्थान ट्रेक्टर और अन्य मशीनों ने ले लिया है इसलिए बैल और बछड़ा आम गरीब किसान के ऊपर सिर्फ एक बोझ है इसलिए वह उन्हें सड़कों पर खुला छोड़ देने के लिए बेबश है – ऐसी समझ और सहानुभूति मेरी भी थी।

गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के वरिष्ठ सदस्य श्री सुनील मानसिंहका और डॉ नंदनी भोजराज द्वारा दिए गए व्याख्यानों से ज्ञान हुआ कि ‘गोबरधन’ शब्द कहाँ से, कैसे और क्यों आया, क्यों भगवान् श्री कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में माखन खाने की लीला रची, क्यों श्रीकृष्ण गाय, बछड़े और बैलों का पालन करते थे, क्यों हमें कभी श्रीकृष्ण, उनकी गौशाला और लीलालों में भैंसें नज़र नहीं आतीं, क्यों हमारे आँगन गाय के गोबर से लीपे जाते रहे हैं, गाय के कंडों को सुबह शाम अपने खेतों और घरों के आस पास जलाने का क्या वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो सकता है, और यह कि ये तमाम चीजें धर्म से जोड़ी गयीं ताकि इनका पालन व्यक्ति और समाज करता रहे और उसका फायदा सभी को मिलता रहे।

संस्थान द्वारा गौ-मूत्र अर्क पर प्राप्त पेटेंट, गाय के गोबर, गौ-मूत्र, तथा उनसे तैयार खाद और कीट नियंत्रक आदि की लैब रिपोर्ट्स से यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि सदियों से यूँ ही तमाम परम्परायें, रीति रिवाज, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, पूजा पाठ आदि हमारी संस्कृति में नहीं जोड़ दी गयीं। सभी कर्मकांडों और कृत्यों के पीछे विज्ञान है जिसे बदकिस्मती से हमारी अंग्रेजी शिक्षा पद्धति में नहीं सिखाया पढाया जाता। पढाया भी कैसे जाता, जब ये सब चीजें विदेशी संस्कृति में न पहले रही हैं और न अभी हैं।

धीरे धीरे ही सही परन्तु तथाकथित विकसित पश्चिमी समाज और देश भारतीय परंपरागत मूल्यों को पहचानकर न केवल अपना रहे हैं बल्कि उन पर अपना एकाधिकार जमाने के लिए पेटेंट आदि का सहारा भी ले रहे हैं। योग और आयुर्वेद ऐसे दो बड़े उदाहरण हैं। हमारी खेती भी हमेशा से गौ-कृषि रही हैं। परन्तु विदेशी और फिर बाद में देशी व्यवसाइयों की कठपुतली बनी हमारी सरकारों ने हकीकत जानते हुए मिटटी, कृषि, और आम जन के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होने दिया।



गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के कार्य

गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र स्वयं में एक प्रयोगशाला है जो यह करके दिखाती है कि कैसे देसी गाय, उसके बछड़े और बैल आदि किसान और गाँवों को न केवल आत्मनिर्भर बनाते हैं बल्कि समृद्धी भी प्रदान करते हैं। देसी गौ-वंश का गोबर और गौ-मूत्र एक धन है (आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में)। यह गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र सभी को सिखाता है।

यह केंद्र किसी भी शिक्षित-अशिक्षित पुरुष एवं महिला, छात्र-छात्रा, किसान, पशुपालक आदि को प्रत्येक माह 5 दिन का आवासीय प्रशिक्षण निःशुल्क प्रदान करता है। इसमें जैविक खेती, केंचुआ खाद, कम्पोस्ट खाद, जीवामृत, जैविक कीट नियंत्रक, वर्मीवाश, नर्सरी (जीवाश्म) मिटटी के साथ साथ गाय के गोबर और गौ-मूत्र से बनने वाले रोजाना उपयोग की वस्तुएं जैसे साबुन, फेसपैक, दंतमंजन, अग्निहोत्र कंडे, मच्छर भागने वाली जहरीले रसायन रहित कोईल, धूप बत्ती, गौ-मूत्र अर्क, गोनाइल आदि का निर्माण करना सिखाया जाता है।

इनका प्रशिक्षण लेकर गरीब से गरीब किसान या पशुपालक भी स्वयं के साथ साथ अपने परिवार को आर्थिक आधार पर आत्मनिर्भर बना सकता है।

केंद्र में वैद्य और चिकित्सक आदि प्रोफेशनल्स को पंचगव्य दवाओं के अनुसन्धान और निर्माण आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।

रसायन और ज़हर आदि से मुक्त खाद्य पदार्थ का एक मात्र विकल्प – देसी गौवंश

वनों के संरक्षण में सदियों से गौ-वंश का योगदान रहा है। आज हमने वनों आदि से गौ-वंश के चारागाह छीन लिए हैं। पहले जब गौ-वंश को वनों में चराने के लिए ले जाया जाता था तब वहां विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों से युक्त चारा का सेवन करके गाय हमें सभी तरह की बीमारियों से लड़ने वाले पोषक तत्वों से भरा दूध प्रदान करती थी। बदले में उनके गोबर और गौ-मूत्र से वनों को मिटटी का उपजाऊपन प्राकृतिक रूप से बना रहता था।

हमारे घरों में पहुँचने वाले दूध की सच्चाई

आज हमारे घरों में जो दूध आता है वह असल में दूध है ही नहीं। पहले तो उसमें वे आयुर्वेदिक पोषक तत्व नहीं हैं जो गायों को वनों से प्राप्त हुआ करते थे। गायों को विभिन्न प्रकार के ज़हरीले इंजेक्शन और दवाएं खिलाई जाती हैं ताकि वह ज्यादा से ज्यादा दूध दे। ज़ाहिर है वे ज़हर दूध के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। आज लाखों दूध बेचने वाले यूरिया, शैम्पू रिफाइंड तेल आदि से कृतिम दूध बनाकर बेचते हैं जिनकी गुणवत्ता जांचने का हमारे पास कोई साधन नहीं है। हमारे घर दूध आता है या दूध के नाम पर यूरिया, शैम्पू या अन्य कोई रसायन – हमें नहीं मालूम।

दूसरी तरफ लगभग 3-4 दशकों से सब्जी, अनाज, फल आदि के उत्पादन में अंधाधुंध केमिकल, फ़र्टिलाइज़र और कीटनाशकों का उपयोग होता है। यही वजह है कि आज कम उम्र में प्राणघातक बीमारियाँ चारों तरफ से हमें घेरे हुए हैं और अस्पताल कुकरमुत्तों की तरह पनपते जा रहे हैं।

तमाम लैब रिपोर्ट्स और जांचों से यह आज सिद्ध हो चुका है कि देसी गौवंश के गोबर और मूत्र से अच्छा प्राकृतिक यानी जैविक खाद और कीट नियंत्रक दूसरा कोई नहीं। यूरिया और डीएपी आदि में गिने चुने पोषक तत्व होते हैं वे भी रसायन यानी ज़हर से भरे। परन्तु देसी गाय के गोबर और गोमूत्र में 16 से अधिक पोषक तत्व मौजूद हैं जिनकी आवश्यकता मिट्टी को अपनी पोषकता बनाने के लिए होती है।

किसानों को संसथान में स्वयं के द्वारा कई तरह के खाद और कीट नियंत्रकों का निर्माण और प्रयोग का प्रशिक्षण व्यावारिक रूप से दिया जाता है। किसानों की आय कम होने, लागत बढ़ने, मिट्टी की गुणवत्ता कमजोर होने, उत्पादन कम होने आदि का एक मात्र कारण उर्वरक और कीटनाशकों के लिए बाज़ार पर निर्भर होना है। अगर किसान स्वयं ही खाद और कीट नियंत्रक बनाकर उनका उपयोग करने लगे तो न केवल उसकी लागत में कमी आती है बल्कि उत्पादन भी बढ़ता है। ऐसा उत्पादन जो उसकी और दूसरों की सेहत के लिए सबसे ज्यादा जरुरी है।

एक तरफ हम गौ-वंश की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, दूसरी तरफ हमने धरती माँ को बंजर कर दिया है, तीसरी तरफ हम जहरीला अनाज, सब्जी और फल आदि बेचकर भी लोगों को मौत के मुंह में धकेलकर पाप के भागीदार बने हैं। ऐसे में भगवान् श्रीकृष्ण का किसानों से नाराज़ हो जाना स्वाभाविक है।

हरित क्रांति से लेकर अब तक जो पीढ़े जन्मी और बड़ी हुई है उसने शायद जैविक भोजन का स्वाद न चखा हो। गो-विज्ञान संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान 5 दिन हमने उन्हीं के खेत में उगाये गए चावल, सब्जी आदि का सेवन किया। सिर्फ 5 दिन में हमने उस जैविक भोजन का शरीर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर को महसूस किया और पाया कि स्वास्थ्य से बढ़कर कोई दूसरा धन नहीं। पैसे कमाने की अंधी दौड़ में हम अपनी तिजोरी और बैंक नोटों से तो जरुर भर लेते हैं लेकिन शायद बड़े बड़े अस्पतालों में खर्च करने के लिए।

गोबरधन से स्वरोजगार

बढती बेरोजगारी के दौर में हमारे देश के किसानों, युवकों, बेरोजगारों के पास के सुअवसर है कि देसी गौवंश की रक्षा और पालन के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सक्षम बना जा सकता है। इस संस्थान में प्रशिक्षण के बाद यह सिद्ध होता है और ऐसा आत्मविश्वास जाग जाता है कि मात्र एक देसी गाय के पालन से स्वास्थ्य से भरा रोजगार कोई भी व्यक्ति अपने लिए स्थापित कर सकता है। गाय के गोबर से रसोई घर में बनने वाली गैस, बिजली, और वाहन आदि चलाने वाली सीएनजी गैस आदि का भी उत्पादन होता है। गोबरधन की पूजा का महत्त्व इसलिए हमारे शास्त्रों और धर्म ग्रंथों में वर्णित है।

प्रशिक्षण हेतु संस्थान का पता और सम्पर्क जानकारी

जिन भी व्यक्तियों को यह महत्वपूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त करना है वे संसथान के फ़ोन पर जानकारी लेकर उस महीने में होने वाले प्रशिक्षण में भाग ले सकते हैं।

‘सेवाधाम’ गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र

देवलापर, तहसील – रामटेक

जिला – नागपुर (महाराष्ट्र) – 441 408

फोन – 0712-2772273, 2734148

वेबसाइटwww.govigyan.co.in 

गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र मध्य भारत में भारतीय स्वास्थ्य, ग्राम, प्रदेश और देश स्वराज के लिए आशा का केंद्र है। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। हमारा देश स्वास्थ्यवर्धक भोजन, अनाज, सब्जी, फलों, दूध और दूध आधारित उद्योगों, गोबर से निर्मित रसोईगैस, बिजली और प्रदूषण रहित वाहनों के ईंधन में पूरे विश्व का गुरु बन सकता है।

हमारे देश को विश्वगुरु बनाने में अगर किसी में क्षमता है तो वह हमारे श्रीकृष्ण की गैया में है। गाय पृथ्वी पर जीवन की माता क्यों है, यह बात अगर व्यवहारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझनी है तो एक बार इस अनुसन्धान केंद्र में 5 दिवसीय प्रशिक्षण में सम्मिलित होना होगा।