आम जनता के 3000 करोड़ रूपये सिर्फ एक मूर्ती के लिए – एकता दिवस

सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक और दिन एक दूसरे को बधाइयाँ देने का। गुजरात में देश की सरकार लगभग 3000 करोड़ की लागत से बनने वाली विश्व की सबसे ऊंची मूर्ती का निर्माण करवा रही है।

क्या भारत देश मूर्तियों का देश है?

Statue of Unity – Approx. Cost is Rs. 3000 Crore

शायद हाँ। हम सभी आम जनता मूर्तियाँ ही तो हैं।

नेता और सरकारें अपनी मन मर्ज़ी चाहे जो करती रहें, हमारा काम सिर्फ यही होता है कि पत्थर की मूर्ती बनकर सबकुछ चुपचाप होता देखते रहें।

कोई हाथियों की मूर्तियां बनवाता है तो कोई अपने दिवंगत महापुरुषों की तो कोई भगवान् आदि की। यह सब आम जनता के खून पसीने की कमाई के पैसे से। हमसे पूछा भी नहीं जाता और सारे निर्णय सरकार और नेता ऐसे कर लेते हैं जैसे वो जनता और देश के मालिक हैं।

क्या इन सब मूर्तियों को बनवाने के लिए कोई वोटिंग करवायी है सरकार ने?

क्या 50% से ज्यादा जनता चाहती है कि देश में अस्पताल, स्कूल, सड़कें, पेड़, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, पर्यावरण, नदियाँ, पीने के पानी आदि की व्यवस्था से पहले सभी महापुरुषों की बड़ी बड़ी मूर्तियाँ बनें? 1 लाख करोड़ से ज्यादा की लागत से जापान से बुलेट ट्रेन खरीदी जा रही है जबकि इतनी ही राशि से देश की मौजूदा खस्ता हाल रेल व्यवस्था को चुरुस्त और दुरुस्त किया जा सकता है।

आये दिन ट्रैन के एक्सीडेंट में कौन सा कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री मारे जाता है? मरना तो आम जनता को होता है। ये लोग तो प्राइवेट गाड़ियों में और हवा-हवाई सफर करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि 3 साल में प्रधानमंत्री ने जो विदेशों की यात्रायें की हैं उनसे उन्होंने यह सीखा है – हर बड़े, अमीर और विकसित देश से एक एक बड़ी चीज की नक़ल देश में बना लो तो हमारा देश भी उन देशों की तरह हो जायेगा।

जैसे US से Statue of Liberty की नक़ल Statue of Unity बना लो तो हम अमेरिका जैसे लगने लगेंगे। जापान से बुलेट ट्रेन ले आओ तो हम जापान जैसे विकसित हो जायेंगे। काश ये उन अमीर देशों में चलने वाले गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, पर्यावरण, जैविक खेती, सम्पन्न किसानों का भी कुछ ज्ञान ले आये होते तो देश की जनता का भला हो गया होता।

Citizens of India

लेकिन उन्होंने जरुरत ही महसूस नहीं की होगी। देश की मूढ़ और मूर्ति जैसी जनता को इन सबकी क्या जरुरत जो वे उनमें जबरन अपना दिमाग खपाते? देश के गरीब बच्चे को अगर स्कूल में Quality Education दे दो तो उन्हें सारे महापुरुषों और उनके आदर्शों का सम्पूर्ण ज्ञान हो जायेगा।

ये बात अलग है कि आप देश विदेश से पर्यटकों को बुलाकर इस मूर्ति को देखने की टिकट से आय को अंबानी अडानी जैसे मित्रों के लिए पैसा इकठ्ठा करना चाह रहे हों, तो बात अलग है। आखिर भविष्य में उनके करोड़ों अरबों के लोन माफ़ करने के लिए पैसा भी तो होना चाहिए!

आज पूरे देश में सरकारी यानी जनता के पैसे से समारोह, रैली, प्रचार प्रसार करके आपको और आपके लोगों को स्वयं की मार्केटिंग भी तो करनी होगी। देश में जाति और धर्म के नाम पर नफरत फैलाकर अब हम “एकता दिवस” मनाने निकले हैं।

इतिहास में अपना नाम दर्ज करने के लिए ये सब काम किये जा रहे हैं। स्कूल और कॉलेज की किताबों में जब भी इस बात का जिक्र होगा की विश्व की सबसे बड़ी मूर्ती Statue of Unity किसने बनवाई तो नाम आएगा प्रधानमंत्री का। जब प्रतियोगिता परीक्षा में पूछा जायेगा की भारत में पहली बुलेट ट्रेन कौन लेकर आया तो 4 में से एक विकल्प प्रधानमंत्री के नाम का आयेगा।

इतिहास में नाम जनता के लिए अच्छे काम करके भी बनाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए अब वक़्त नहीं है।  प्रधानमंत्री की उम्र 65 साल से ज्यादा की हो गयी है। और क्या भरोसा अगली बार सरकार बने न बने, प्रधानमंत्री बनने का मौका मिले न मिले। इसलिए कम वक़्त में दिखावे के काम करके जितना ज्यादा से ज्यादा किताबों में अपना नाम दर्ज हो सके करा लिया जाये।

आदर्शों पर चलना कठिन ही नहीं नामुमकिन सा लगता है इसलिए मूर्ती बनाकर दिखावा बस कर दो कि हम उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। चाहे वह राम की मूर्ती हो, नेहरू की, इंदिरा की, या सरदार पटेल की। जैसा देश वैसा भेष। और इस देश का भेष है पाखण्ड और दिखावा।

आम जनता के इस पैसे से उन लाखों गरीब बीमार लोगों का इलाज हो सकता है जो पैसे न होने की वजह से प्राइवेट अस्पतालों में अपना इलाज नहीं करा पाते और सामने से आती मौत के मुंह में समा जाते हैं। गरीब बच्चों के सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण सुधार हो सकते हैं।

लेकिन प्रधानमंत्री को क्या पड़ी? उनका न अपना कोई परिवार है और न बच्चे। और अगर होता भी तो क्या उनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते? क्या उनके परिवार का कोई सदस्य पैसे के अभाव में गंभीर बीमारी का इलाज न करा पाने की वजह से कभी मौत को सामने से आते देखेगा?

सभी ‘मूर्तियों’ को ‘एकता दिवस’ की हार्दिक शुभकामनायें।

महिलाओं के बलात्कार, बच्चों की तस्करी, एसिड अटैक आदि से मुक्ति बिना कैसा हिन्दू राष्ट्र?

भगवान् श्री राम ने जब रावण को मार दिया था उसके बाद सीता जब उनके पास आयीं तब राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, वह भी सबके सामने। क्यों?

कुछ लोगों का जवाब है की राम और सीता को पहले से ही पता था कि सीता का अपहरण होगा क्योंकि दोनों का जनम ही रावण के वध के लिए हुआ था। इसलिए अपहरण से पहले राम ने सीता को अग्नि देवता के संरक्षण में भेज दिया था। रावण ने जिस सीता का अपहरण किया था वो असल की सीता नहीं थी । वे केवल सीता की परछाई थीं। इसलिए सबकी अनुपस्थिति में राम ने असली सीता जी को अग्नि देवता के संरक्षण में भेज दिया था। यह सब तब हुआ जब सिर्फ राम, सीता और अग्नि देवता मौजूद थे।

जब सीता रावण की लंका से वापस आयीं तो क्या यह आवश्यक था कि राम सबके सामने सीता जी का यह कहकर कि पहले अग्नि परीक्षा दो उसके बाद मेरे पास वापस आओ, उनका अपमान करते? जब राम ने सीता से अग्नि परीक्षा देने के लिए कहा उस समय सीता सहित सभी उपस्थित लोगों हनुमान, लक्ष्मण, विभीषण, सुग्रीव और वानर सेना की आँखों में दुःख के आंसू थे। लेकिन कोई प्रश्न भी तो नहीं कर सकता था।

बाद में जब लक्ष्मण ने राम से प्रश्न किया कि क्यों आपने सीता जी की अग्नि परीक्षा लेकर उन्हें सबके सामने अपमानित किया तब राम ने सीता की परछाई के रावण द्वारा अपहरण और अग्नि देवता द्वारा असली सीता की सुरक्षा वाली बात बताई। यह बात तो राम तब भी बता सकते थे जब उन्होंने सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए कहा। या फिर जैसे सबकी अनुपस्थिति में सीता को अग्नि देवता के हवाले किया था ठीक वैसे ही अकेले में अग्नि देवता से असली सीता वापस भी ले लेते।

अगर राम ने सीता जी के साथ कोई दुर्व्यवहार या अपमान नहीं किया तो क्या तुलसीदास जी ने जबरन यह बात रामचरित मानस में डाल दी थी? जब सबके सामने अग्नि परीक्षा ले ही ली थी तो एक ‘धोबी’ के कहने पर सीता जैसी चरित्रवान स्त्री को गर्भावस्था में श्री राम ने जंगल में असहाय और बेसहारा बनाकर भटकने के लिए क्यों छोड़ा? जबकि राम, लक्ष्मण, सीता और सारी दुनिया जानती थी कि सीता ने राम के पास वापस आने से पहले अग्नि परीक्षा दे दी थी।

श्री राम को एक ‘धोबी’ की बात को चोरी छुपे सुन लेने के बाद क्या आवश्यकता थी कि उन्होंने अपनी धर्मपत्नी के साथ-साथ उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को जंगल में छोड़ दिया, उन्हें घर से निकाल दिया? उस धोबी ने अपनी पत्नी पर शक किया, उसे मारा पीटा और घर से निकालना चाहा क्योंकि वह एक रात अपने घर से बाहर किसी के यहाँ रुकी थी। श्री राम को अपनी पत्नी पर कोई शक नहीं था। वे जानते थे की सीता से ज्यादा पतिव्रता और चरित्रवान स्त्री इस धरती पर दूसरी नहीं हो सकती। राम ने सीता के साथ धोबी द्वारा अपनी पत्नी के प्रति जैसा कोई दुर्व्यवहार नहीं किया। परन्तु उन्होंने सीता जी का त्याग जरुर किया। शायद यह किसी दुर्व्यवहार और अपमान से कम नहीं था।

वर्तमान के सभ्य समाज में अगर कोई पढ़ा लिखा और समझदार पुरुष अपनी चरित्रवान और पतिव्रता पत्नी और उसके पेट में पल रहे बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार करेगा तो हमारी उस व्यक्ति और घटना के बारे में क्या सोच होगी? बेचारी सीता माता अकेली वन में भटकती रहीं। क्या उस वक़्त श्री राम को सिर्फ अपने राज्य, उसकी प्रतिष्ठा, सम्मान, और लोगों की बातों की चिंता थी?

शायद हमारा समाज भी ऐसा ही व्यवहार ज्यादातर स्त्रियों के साथ करता है। किसी ने अगर कोई गलत बात हमारी पत्नी या प्रेमिका के सम्बन्ध में कही नहीं कि हम उस पर शक करने लगते हैं, उसे बुरा भला कहने लगते हैं। बहुत लोग (अनपढ़, गरीब, पढ़े लिखे, बड़े बड़े धनाड्य सभी तरह के) शराब पीकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मार पीट भी करते हैं, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। उन्हें छोड़ देते हैं, तलाक ले लेते हैं, कई बार हत्याओं तक को अंजाम दे देते हैं।

स्त्री या महिला कितनी भी पढ़ी लिखी, समझदार और सक्षम हो उसे कमजोर ही आँका जाता है। पूरा प्रयत्न किया जाता है की उसे परिवार, समाज, राजनीती, ऑफिस, संगठनों आदि सभी जगह पुरुषों से नीचे ही रखा जाए। वर्ना कोई वजह नहीं कि सुषमा स्वराज भाजपा की प्रधानमंत्री उम्मीदवार या देश की प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं।

श्रीराम के आदर्शों पर चलने वाले हम सभी लोग जो राम मंदिर बनता हुआ जल्द से जल्द देखना चाहते हैं, उनके पास मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आदर्शों पर आधारित एक आदर्श वर्तमान कलयुग में स्थापित करने का मौका है। श्री राम ने तो अपनी प्रजा में से एक व्यक्ति की घटिया बात के लिए भी बड़े से बड़ा त्याग यानी अपनी जीवन संगिनी का त्याग कर दिया था, क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की बहुत बड़ी जनता के लिए अपने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर एक महिला को देश की प्रधानमंत्री नहीं बनने दे सकते। क्या सीता जी का खोया हुआ सम्मान हम वापस देने का एक प्रयास नहीं कर सकते?

Who can be the better Prime Minister? 1. Narendra Modi. 2. Sushma Swaraj

एक बार श्री राम (पुरुष) ने देश का साम्राज्य संभाला। क्या इस बार किसी सीता (स्त्री) को मौका नहीं मिलना चाहिए? धोबी का हमारी नज़र में अर्थ सिर्फ वह व्यक्ति नहीं जो कपडे धोता और स्त्री करता  है। धोबी का एक दूसरा अर्थ है – वह जो मैल और गन्दगी को साफ़ करता है। हम देश और राजनीती में गहरे दाग, धब्बों, गन्दगी, मैल को साफ़ करना चाहते हैं। कृपया हम ‘धोबियों’ की आवाज़ सुन लें और सुनकर अनसुना न करें।

देश में एक नहीं लाखों और करोड़ों ‘धोबी’ यह पुकार कर रहे हैं कि त्रेता युग में हमारे एक बेवक़ूफ़ भाई की वजह से सीता जी को अपमानित होकर जंगल जंगल भटकना पड़ा। उसने जब अपनी पत्नी का सम्मान नहीं किया तो वो सीता जी की क्या इज्जत करता? हमारा विनम्र निवेदन है कि उसकी भूल को क्षमा कर दें और सीता जी के खोये हुए सम्मान की पुनर्स्थापना हेतु प्रयास करें। राम मंदिर बनाना अच्छी बात है लेकिन उससे भी ज्यादा आदर्श बात महिला और स्त्री यानी सीता को सही मायनों में बराबर के स्थान पर आने देना है। सीता ही इस धरती की सभी स्त्रियों (मिटटी, प्रकृति, नदियों, महिलाओं, बेटियों आदि) की पीड़ा समझकर उसे बचा सकती है।

राज सिंहासन और सत्ता ही सर्वोपरि है ऐसा उदहारण बार बार स्थापित न करें। कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और पार्टी के ऊपर से यह विशवास उठने लगा है कि वे सत्ता के अलावा किसी से प्रेम नहीं करते। कहीं महिलाओं को और लोगों को भी यह न लगने लगे कि जो व्यवहार राम के हाथों सीता का हुआ, धोबी के द्वारा उसकी पत्नी का हुआ, वही व्यवहार हमारे देश के सभी प्रतिनिधि और समाज अपनी स्त्री जाति के साथ कर रहा है।

स्त्री जाति के प्रति अत्याचार क्या एक सोची समझी साजिश है?

राम मंदिर के बनाये जाने की बात होती है, सीता के मंदिर की बात कभी नहीं होती? क्या राम मंदिर इस बात का सूचक है कि समाज में पुरुषों का स्त्रियों पर वर्चस्व कायम रहे? पुरुष स्त्री को हमेशा अपने से निचले स्थान पर रखे? उसे हमेशा कमज़ोर और असक्षम समझता रहे?  क्या बेटियों को पढने लिखने से इसलिए वंचित रखा जाता था ताकी उनमें कोई समझदारी पैदा ना हो सके? क्या जान बूझकर महिलाओं और बेटियों पर होने वाले अत्याचारों को नज़र अंदाज़ किया जाता है ताकी उनका जीवन इसी अत्याचार और उससे मुक्ति के संघर्ष में बीतता रहे?

क्या सीता जी का उदाहरण देकर स्त्रियों को उन्हीं की तरह पतिव्रता बनने के लिए प्रेरित किया जाता हैं और राम को आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित किया गया ताकी पुरुषों के अत्याचार के बावजूद भी स्त्रियाँ उनके प्रति समर्पित रहकर गौरवान्वित महसूस करती रहें? उन्हें इस अहसास में ही संतुष्टि मिलती रहे कि उन्हें पतिव्रता नाम का पुरूस्कार और ख्याति मिलती हैं? क्या श्री राम को इसलिए आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित किया गया है ताकी सिंहासन और राज्य के लिए अगर स्त्री (महिला, पृथ्वी और प्रकृति) आदि का त्याग भी करना पड़े तो लोग उसे सही मानें?

रामायण का सच चाहे जो हो लेकिन वर्तमान भारत का सच तो यही है। पुरुष प्रधान समाज, सत्ता, राजनीती और धर्म की कुर्सियों पर बैठे सभी तरह की पितृसत्ताओं ने उनकी समाज, राजनीति, सरकार, धन कमाने के सभी साधनों में अपनी पकड़ मजबूत बनाये रखने के लिए स्त्री जाति (महिला, पृथ्वी और प्रकृति) का शोषण और दोहन किया है और कर रहे हैं। आज महिलाओं, पृथ्वी, प्रकृति और बच्चों की हालत बिलकुल वैसी है जैसे सीता जी और उनकी संतान की राम द्वारा त्याग के पश्चात् हो गयी थी।

प्रधानमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की स्वयं की अपनी कोई बेटी नहीं है। क्या इसलिए उन्हें प्रतिदिन होने वाले बेटियों के साथ बलात्कार से तकलीफ नहीं होती? अगर होती है तो उस बारे में नाम मात्र की चर्चा उनके भाषणों और कार्यों में नज़र क्यों नहीं आती? अगर होती भी है तो क्या सिर्फ भाषणों और चर्चाओं में शामिल हो जाने मात्र से वे सुरक्षित हो जा रही हैं? दिल्ली की कानून व्यवस्था और पुलिस तो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। वहाँ क्यों सबसे ज्यादा बलात्कार, छेड़खानी, हत्या आदि की वारदातें हो रही हैं? क्यों उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में अब भी महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार, हिंसा, अपहरण, हत्या जैसी वारदातें बदस्तूर जारी हैं?

RSS and Pracharak
RSS and Pracharak

क्यों आज तक कोई सख्त कानून देश में नहीं बन सका? अपनी पत्नी को छोड़ देने के इलज़ाम भी प्रधानमंत्री पर लगते रहे हैं। क्यों उन्होंने अपनी गरीब माँ और विवाह करके पत्नी को छोड़ा? क्यों राज्य और केंद्र की सरकारें और नेता देश की महिलाओं, बेटियों और बच्चों के प्रति अपराध, बलात्कार, अपहरण, तस्करी, हत्या, असिड अटैक आदि को समाप्त करने के लिए कड़े से कड़े कानून और सजा का प्रावधान नहीं करती?

क्या इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री, हिन्दू संगठनों के प्रमुख, धार्मिक गुरुओं आदि की अपनी स्वयं की पत्नी, बच्चे, बेटियां नहीं हैं?

ज्यादातर आरएसएस के प्रचारक आजीवन अविवाहित होते हैं, वे कभी अपना परिवार नहीं बनाते, उनके स्वयं के पत्नी, बेटे और बेटियां नहीं होती। कम से कम उच्च स्तरीय प्रचारक तो विवाहित नहीं होते। आज तक कोई विवाहित व्यक्ति जिसकी अपनी पत्नी और बच्चे हों, आरएसएस का प्रमुख नहीं बना। क्या सिर्फ इसलिए वे सिर्फ राम मंदिर, हिन्दू-राष्ट्र और गौ रक्षा की बातें करते हैं? हिन्दू राष्ट्र की लाखों करोड़ों महिलाओं और बच्चों की रक्षा का ख्याल उन्हें कभी नहीं आता? क्या महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले अत्याचारों, बलात्कारों, हिंसा, हत्या, वैश्यावृत्ति आदि से मुक्ति बिना हिन्दू राष्ट्र के कोई मायने हैं?

संदिग्ध गौ-हत्या करने वाले बहुत से लोगों की हत्या तो गौ-रक्षकों ने कर दीं लेकिन आज तक एक भी खबर किसी बलात्कारी की भीड़ द्वारा लिंचिंग और हत्या की नहीं आई? आज तक किसी ऐसे अपराधी को भीड़ ने पकड़कर जान से नहीं मारा जो महिलाओं और बेटियों की वैश्यावृत्ति, अंगो की तस्करी, घरेलु और औद्योगिक कामों के लिए जबरदस्ती और अपहरण जैसे अपराध करता है। हर साल 2 लाख से ज्यादा गरीब महिलाओं और बच्चों की तस्करी भारत में होती हैं। 35 हजार से ज्यादा बलात्कार और हत्याएं होती हैं। 500 से ज्यादा महिलाओं और बेटियों पर असिड अटैक होते हैं। क्या ये हिन्दू समाज और हिन्दू राष्ट्र का हिस्सा नहीं? या हिन्दू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों के खिलाफ लडाई करना, नारे लगाना, भगवा झंडा लहराना, राम मंदिर बनाना, गौ-हत्या बंद करना मात्र है?

धार्मिक गुरुओं, शंकराचार्यों, मंदिर और मठों के पुजारियों, प्रवचनकर्ताओं आदि के भी अपने परिवार, पत्नी, बेटे और बेटियां नहीं होतीं। क्या इसलिए उन्हें भी सिर्फ गौ-हत्या और राम मंदिर की फिकर है? उन सभी की आवाज़ महिलाओं, बेटियों, बच्चों के प्रति होने वाले अत्याचारों, नष्ट होती प्रकृति, नदियों, जंगलों आदि के खिलाफ क्यों बुलंद नहीं होती?

अयोध्या का राम मंदिर अपने पुरुष अहंकार की पूर्ति और ज़िद मात्र है, ऐसा अब प्रतीत होता है। महिलाओं और बच्चों की जान, सम्मान, इज्ज़त, उत्थान से किसी को कोई लेना देना नहीं। है तो सिर्फ भाषणों में।